
गाजियाबाद। जहां सोमवार को पूरा देश रक्षा बंधन के पर्व में सराबोर होगा और बहनें अपने भाईयों की कलाईयों पर राखी बांधकर अपनी सुरक्षा की कामना करेंगी। लेकिन आज भी मुरादनगर के गांव सुराना के लोग रक्षांबधन को अपशकुन मानते हैं। उनका मानना है कि सदियों पूर्व तत्कालीन शासकों द्वारा चलाये गये दमन चक्र एवं नरसंहार की घटना के परिपेक्ष्य में आज भी गांव सुराना व सुठारी में छबाड़िया गौत्र के लोग रक्षांबधन के पर्व को अपशगुन मानते हैं।
हिंडन नदी किनारे सुराना गांव बसा है। मुरादनगर विकास खंड का सबसे अधिक आबादी वाले सुराना गांव को पहले सोहनगढ़ के नाम से जाना जाता था। सुराना गांव के बुजुर्ग मास्टर तेजपाल, विनोद यादव, सुठारी के पीतम सिंह, रामवीर सिंह यादव, महावीर प्रसाद यादव, छित्तर सिंह यादव व कमल सिंह आदि ने बताया कि सुराना-सुठारी गांव में अधिकांश आबादी छबड़िया गौत्र के लोगों की है। उनके पूर्वज 1106 में यहां आए थे। सैंकड़ों वर्ष पूर्व राजस्थान से आए पृथ्वीराज चौहान के परिजन छतर सिंह राणा ने हिंडन नदी किनारे डेरा डाला था, उनके पुत्र सूरजमल राणा ने थे। सूरजमल राणा के दो पुत्र विजेश सिंह राणा व सोहरण सिंह राणा थे। विजेश सिंह राणा को घुड़सवारी का शौक था।
उन्होंने बुलंदशहर की जसकौर से शादी कर ली थी। वह हिण्डन नदी के किनारे रहने लगे, तब इसका नाम सोहनगढ़ रखा गया। जब मोहम्मद गौरी को पता चला कि सोहनगढ़ में पृथ्वीराज चौहान के परिजन रहते हैं, तो उसने रक्षाबंधन वाले दिन सोहनगढ़ पर हमला कर औरतों, बच्चों, बुजुर्गों व जवान युवकों को हाथियों के पैरों तले जिंदा कुचल दिया था। हमले में विजेश सिंह राणा हत्या हो गई थी। जबकि हमले वक्त सोहरण सिंह राणा गंगास्नान हो गये थे। विजेश सिंह राणा की मृत्यु की खबर मिलते ही उनकी पत्नी जसकौर सती हो गई थी। जिसका प्रमाण आज भी गांव में खंडहर की हालत में वो मंदिर दिखाई देता है।
ऐसा कहा जाता है कि छबड़िया गौत्र के लोग तब से रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाते हैं। गांव की केवल एक महिला राजवती जिंदा बची थी। सोहरण सिंह राणा की पत्नी राजवती उस वक्त बुलंदशहर के उल्हैडा गांव अपने मायके पिता सुमेर सिंह यादव के घर गई हुई थी। मायके में उसने दो पुत्र लखी व चुपड़ा को जन्म दिया। दोनों का नंदसाल में पालन पोषण हुआ। बेटों ने बड़े होने पर मां से पिता और अपने परिवार के बारे में पूछा। राजवती ने बेटों को मोहम्मद गौरी द्वारा परिवार के मारे जाने की बात बतायी। तब लखी व चुपड़ा के साथ राजवती सोहनगढ़ वापस आई और गांव को दोबारा बसाया। सोहनगढ़ बसने के वर्षों बाद सुठारी गांव को बसाया गया। सुठारी गांव में छबड़िया गौत्र के लोग हैं। वह भी रक्षाबंधन के पर्व को अपशकुन बताते हैं।
बालाजी मंदिर के महंत धर्मपाल दास ने बताया कि गांव में मान्यता है कि यदि कोई रक्षाबंधन वाले दिन किसी परिवार में पुत्र उत्पन्न हो या गाय में बछड़े को जन्म दे तो वहीं रक्षाबंधन मना सकता है। गांव सुराना आज भी अतीत की घटनाओं को अपने में समेटे हुए हैं। गांव में एक इंटर कॉलेज, जिला सहकारी बैंक के अलावा प्राचीन एंव ऐतिहासिक धुमेश्वर महादेव शिव मंदिर है। जहां हजारों की संख्या में श्रद्धालुजन श्रावण मास में भगवान शिव शंकर का जलाभिषेक करते हैं।
एक बार मनाया गया था जश्न
गांव सुराना निवासी कमल सिंह का कहना है कि एक मान्यता थी कि रक्षाबंधन वाले दिन किसी गांव की महिला बेटा या गाय के बछड़ा पैदा होने पर पर्व मनाया जा सकता है। रक्षाबंधन वाले दिन जयपाल सिंह यादव के यहां पुत्र पैदा हुआ था। परिवार वालों ने खुशी के साथ रक्षाबंधन पर्व मनाया गया। लेकिन कुछ दिन बाद ही जयपाल सिंह यादव का पुत्र विकलांग हो गया और बाद में नदी में डूबने से उसकी मौत हो गई थी।
मनाते हैं भैयादूज की खबरें
गांव के निवासी विकास यादव का कहना है कि रक्षाबंधन पर्व की भरपाई पूरी करने के लिए गांव के लोग भैयादूज का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। भैयादूज पर अधिकतर बहनें गांव सुराना में भाई के घर आती हैं। वहीं रक्षाबंधन के पर्व की कब गांव वाले जश्न मनाएंगे। इसका बेसब्री से सुराना और सुठारी गांव लोगों को इंतजार है।
लड़कियों को रहता है मलाल
गांव में दूसरी बिरादरी के लोगों के हाथ में राखी बंधी देखकर छबड़िया गौत्र की लड़कियों को मलाल होता है। वहीं सुराना गांव में एक कहावत मशहूर हैं। लखी के लख चार, चुंडा के दो चार। इसका मतलब है कि लखी का एक गांव पूरा बसा है जबकि चुंडा की मात्र एक पट्टी है।
Published on:
05 Aug 2017 05:17 pm
