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एसडीएम के आइडिया ने बदल दीं सरकारी स्कूलों की तस्वीर, प्राइवेट को दे रहे टक्कर

Special- टाट-पट्टी के उन्मूलन से बदल दी सरकारी स्कूलों की सूरत, बढ़ने लगी बच्चों की उपस्थिति

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sharad asthana

Aug 16, 2016

khurja school

khurja school

बुलंदशहर।
सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार का बोलबाला किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में कुछ नया करना सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने जैसा होता है। बेसिक शिक्षा में बदहाली के चलते लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से दूर रखने लगे हैं। ऐसे हालात में बुलंदशहर का एक अफसर इन स्कूलों की सूरत-संवारने में जुटा है।


सरकारी स्कूल का नाम जेहन में आते ही टाट-पट्टियों पर बैठे बदहाल स्कूल की तस्वीर उभर आती है। कागजों के घोड़े कितने ही तेज दौड़ें, लेकिन यह सरकारी स्कूलों की कड़वी सच्चाई है। मगर बुलंदशहर में एक अफसर ने इस सच्चाई को झुठलाने की कोशिश की है। नाम है इंदुप्रकाश, जो बुलंदशहर के खुर्जा सिटी में एसडीएम हैं। इंदुप्रकाश ने सरकारी स्कूलों में घटते छात्रों की सच्चाई को नजदीक से जाना और उस पर काम किया। इंदुप्रकाश बताते हैं कि टाटपट्टी पर बैठना न तो बच्चों को पसंद है और न उनके माता-पिता ऐसे स्कूलो में उन्हें भेजना चाहते हैं। इसीलिए सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या तेजी से कम होती चली गर्इ। सरकार के पास अच्छे और प्रशिक्षित शिक्षक हैं। ऐसे में महज बैठने का साधन न होने की वजह से उनका लाभ बच्चों तक नही पहुंच पा रहा था। एक कोशिश की और हालात बदलते चले गये।


khurja school

सामाजिक संस्थाओं और इलाके के संपन्न लोगों का लिया गया सहयोग


इस काम के लिए सामाजिक संस्थाओं और इलाके के संपन्न लोगों का सहयोग लिया गया। दो महीने में ही इंदुप्रकाश ने इन स्कूलों में लकड़ी की बेंचे मुहैया करार्इं। आज बुलंदशहर की खुर्जा तहसील के सैकड़ों स्कूलो में ऐसी बेंचे मौजूद हैं, जहां बच्चे निजी स्कूलों के जैसी सुविधा का एहसास करते हैं। स्कूल में बेंचे आ जाने से छात्रो की नर्इ भरती भी तेजी से बढ़ी है और बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी खुश हैं। सरकारी स्कूल में कक्षा 3 की छात्रा अर्शी बताती हैं कि अब दूसरे स्कूलों के बच्चे उनका मजाक नहीं उड़ाते। वह अब बेंच पर बैठती है। उन्हें अच्छा लगता है और अब पढ़ाई में भी मन लगता है।


बदल गर्इ है तस्वीर


स्कूल की शिक्षिका गीता बताती है कि हर निरीक्षण के दौरान बच्चों की घटती संख्या को लेकर अधिकारियों की शिकायत रहती थी। लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। बच्चों की संख्या बढ़ी है और अब और बच्चों के लिए न तो स्कूल में जगह है न बैठने के लिए बेंचे है। माता-पिता अब हमारे स्कूल में अपने बच्चों को शौक से भेजना चाहते हैं।




बिल्कुल अलग था एसडीएम का आइडिया


स्कूली बच्चों के लिए बेंचे मुहैया कराने में इंदुप्रकाश की मदद करने वाले खुर्जा सिटी के कारोबारी राजीव बंसल बताते हैं कि एसडीएम साहब का आइडिया बिल्कुल अलग था। इसीलिए हमने भी बढ़-चढ़कर सहयोग किया। सकारात्मक सोच ने स्कूलो की सूरत बदल दी है। बच्चे अब पढ़ने लगे है और उनके चेहरो पर अब मुस्कान भी रहती है।

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