सरकारी स्कूल का नाम जेहन में आते ही टाट-पट्टियों पर बैठे बदहाल स्कूल की तस्वीर उभर आती है। कागजों के घोड़े कितने ही तेज दौड़ें, लेकिन यह सरकारी स्कूलों की कड़वी सच्चाई है। मगर बुलंदशहर में एक अफसर ने इस सच्चाई को झुठलाने की कोशिश की है। नाम है इंदुप्रकाश, जो बुलंदशहर के खुर्जा सिटी में एसडीएम हैं। इंदुप्रकाश ने सरकारी स्कूलों में घटते छात्रों की सच्चाई को नजदीक से जाना और उस पर काम किया। इंदुप्रकाश बताते हैं कि टाटपट्टी पर बैठना न तो बच्चों को पसंद है और न उनके माता-पिता ऐसे स्कूलो में उन्हें भेजना चाहते हैं। इसीलिए सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या तेजी से कम होती चली गर्इ। सरकार के पास अच्छे और प्रशिक्षित शिक्षक हैं। ऐसे में महज बैठने का साधन न होने की वजह से उनका लाभ बच्चों तक नही पहुंच पा रहा था। एक कोशिश की और हालात बदलते चले गये।