
गाजियाबाद। जिस उम्र में अधिकांश भारतीय महिलाएं अपनी शारीरिक बीमारियों का परचम हाथों में लिए घूमती हैं उस उम्र में सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल की डॉयरेक्टर डॉ माला कपूर अंटार्कटिका में तिरंगा फहरा आईं। स्कूल स्टाफ और मीडिया के साथ यात्रा अनुभव साझा करते हुए उन्होंने अपने इस साहसिक कारनामे से सभी को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया। अपने 8 दिवसीय अंटार्कटिका प्रवास के दौरान उन्होंने जलवायु व भौगोलिक स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन किया। एजूकेशन प्रोजेक्ट के रूप में डॉ माला कपूर ऐसी यात्रा करने वाली देश में स्कूल स्तर की पहली महिला हैं। डॉ माला कपूर का यह साहसिक कारनामा विकिपिडिया पर भी दर्ज है।
इस अवसर पर डॉ माला कपूर ने कहा कि उनका मिशन 9 दिसंबर को अर्जेन्टिनिया से शुरू हुआ था। इस अभियान में उनके साथ 10 वैज्ञानिक भी थे। इस दुर्गम अभियान का हिस्सा कैसे बनीं इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देश के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ दत्ता की प्रेरणा और प्रकृति से अत्यंत लगाव की वजह से ही यह संभव हो सका।
डॉ कपूर के मुताबिक अंटार्कटिका पर जाए बिना आप प्रकृति के पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांत और तरीके को नहीं समझ सकते।उन्होंने खुलासा किया कि वहां रहना कितना दुरुह कार्य है और उससे भी अधिक कैमरे से फोटो उतारना। विपरीत मौसम और परिस्थितियों में वह हजारों तस्वीरें उतारने में सफल रहीं। इन तस्वीरों के जरिए अंटार्कटिका की प्रवृत्ति और प्रकृति के विश्लेषण की कोशिश की जाएगी।
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अंटार्कटिका मिशन पर जा चुके जाने माने साइंटिस्ट डॉ एच. एन. दत्ता दत्ता ने कहा कि डॉ कपूर द्वारा लिए गए फोटो का काॅपी राइट लेकर नर्सरी से 8वीं कक्षा के पाठ्यक्रम में को विषय के रूप में दर्ज करवाया जाएगा। यात्रा के अनुभवों की बाबत डॉ कपूर ने कहा कि अंटार्कटिका पर उनका सामना शून्य से 30 डिग्री तापमान और 350 किलो मीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल रही हवा से हुआ। धरती को बचाने के जो विकल्प हम आज खोज रहे हैं वह प्रकृति के पास पहले से ही मौजूद हैं और अंटार्कटिका इसका प्रमाण है।
Published on:
23 Mar 2018 12:31 pm
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