3 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

#PersonOfTheWeek सुपर वुमेन सविता सिंह, जिसने अपने दर्द को दूसरों की दवा बना दिया

विकलांगता पर जीत हासिल कर दूसरों के लिये बनी हैं उम्मीद की किरण। विकलांगों के लिये चलाती हैं संस्था, संचालित करती हैं राजेश्वरी विकलांग विद्यालय।

2 min read
Google source verification
Savita Singh

सविता सिंह

गाजीपुर. एक महिला का जीवन कितने संघर्षों से भरा होता है, और अगर वो शारिरिक रूप से अक्षम हो तो उसकी जिंदगी में खुद इतनी जटिलताएं होती हैं कि सारी उम्र अपने दर्द से जूझते हुए गुजार देती है। पर इन्हीं में से कुछ महिलाएं होती हैं जो न सिर्फ अपने संघर्षों पर जीत हासिल करती हैं बल्कि उनका दर्द ही दूसरों के लिय दवा बन जाता है। ऐसी महिलाओं को हम सुपर वुमेन कह सकते हैं।

आज हम आपको बता रहे हैं उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की ऐसी ही एक सुपर वुमेन सविता सिंह की कहानी जिन्होंने अपनी विकलांगता और अक्षमता को मात देते हुए न सिर्फ खुद को साबित किया बल्कि अपने दर्द को दूसरों के लिये दवा बना दिया। सविता सिंह ने पोलिया से मिली विकलांगता के दर्द को झेलते हुए जिन पथरीले रास्तों पर चलकर अपने संघर्ष का सफर तय किया और मंजिल पायी उन रास्तों को उन्होंने अपने जैसे दूसरों के लिये आसान करने की ठान ली। आज वह खुद एक सरकारी कर्मचारी हैं, और अपनी व्यस्तताओं के बावजूद वो अपने जैसे विकलांगों की मदद के लिये संस्थान चलाती हैं और उनके हौसलों को पंख देने का काम करती हैं। उनके हॉस्टल में 250 विकलांग बच्चे-बच्चियां रहते हैं।

सविता सिंह अपने इस काम के लिये कई पुरस्कारों से सम्मानित की जा चुकी हैं। उन्हें 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से स्टेट एवार्ड दिया गया, तो 2014 में वाराणसी के कमिश्नर ने उनके कार्यों के लिये उन्हें सम्मानित किया ।2015 में सविता सिंह को मशहूर संगीतकार एआर रहमान के हाथों केविन केयर एबिलिटी अवार्ड मिला। तीन दिसम्बर 2018 के यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उन्हें सम्मानित किया।

सवता सिंह बताती हैं कि जब वह पैदा हुईं तो शारिरिक रूप से बिल्कुल सामान्य थीं। छह माह बाद ही वो पोलिया की चपेट में आ गयीं, जिसके चलते उनके एक पैर ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद सविता सिंह के सामने आयीं वो परेशानियां जिनसे एक विकलांग को दो चार होना पड़ता है। मजबूत इरादे वाली सविता ने हार नहीं मानी और उन्होंने खूब मेहनत की। उनकी मेहनत रंग लायी और वह आरईएस डिपार्टमेंट में लेखाकार के पद पर चयनित हो गयीं।

सविता को अपनी मंजिल तो मिल गयी, लेकिन उन्होंने फिर उन्हीं पथरीली राहों की ओर पलटकर देखा जिनपर चलकर उन्होंने अपनी मंजिल पायी थी। उन्होंने तय किया कि वो अपने जैसों की मदद को आगे आएंगी। इस सोच को उन्होंने ‘समर्पण संस्थान’ का नाम दिया और जुट गयीं विकलांगों के हौसलों को उड़ान देने में। वह इतने पर ही नहीं रुकीं। ‘राजेश्वरी विकलांग विद्यालय’ का संचालन शुरू किया। इस विद्यालय में 250 बच्चों को रखकर वह उनकी देखभाल करती हैं। यहां उनकी पढ़ायी से लेकर व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण तक का इंतजाम है ताकि जब वो यहां से निकलें तो किसी पर बोझ न रहें। सविता समाज की ऐसी महिलाओं का भी सहारा बनती हैं जो बेसहारा हैं। मनसिक विक्षिप्त महिलाओं की मदद के लिये भी सविता कुछ करना चाहती हैं।

By Alok Tripathi

Story Loader