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इस बार होली पर बन रहे विशेष संयोग, सुख समृद्धि शांति के लिए करें यह उपाय, जाने ज्योतिष के विद्वानों की राय

Holi Special ज्योतिष गणना के अनुसार इस वर्ष होली पर बन रहे इस विशेष योग का फ़ायदा भी विशेष है। इसके बारे ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री ने बताया कि ऐसा करने से लोगों के तमाम प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं।  

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(1) घर में कोई शारीरिक कष्टों से पीड़ित है ओर उसको रोग छोड़ नहीं रहे है तो 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र बीमार ब्यक्ति के शरीर से 21 बार उसार कर होली की अग्नि में डाल दें, शारीरिक कष्टों से शीघ्र मुक्ति मिल जायेगी।

(2) दुर्भाग्य को दूर करने के लिए होली के दिन से प्रारंभ करके लगातार 41 दिन तक बजरंग बाण का पाठ करे।

(3) होली की राख को घर लाकर उसमें थोडी सी राई व नमक मिलाकर रख लें। इस प्रयोग से भूतप्रेत या नजर दोष से मुक्ति मिलती है।

(4) होली पर पूरे दिन अपनी जेब में काले कपड़े में बांधकर काले तिल रखें। रात को जलती होली में उन्हें डाल दें। यदि पहले से ही कोई टोटका होगा तो वह भी खत्म हो जाएगा।

(5) जो लोग राहु केतु के दोषों से पीड़ित है वे लोग होली में काले तिल अवश्य चढ़ाना चाहिए। इससे राहु केतु के दोषों में आराम मिलता है।

(6) अगर आपको कोई दुश्मन परेशान कर रहा है तो उसके नाम के अक्षरो के बराबर गोमती चक्र लेकर उस पर दुश्मन का नाम लिखकर होली की आग मे डाल दें, दुश्मन से छुटकारा मिल जाएगा।

(7) अगर व्यापार मे रुकावट आ रही है तो होलिका दहन की रात को होली की आग से व्यापार स्थान पर धूप दें, व्यापार सुचारू रूप से चलने लगेगा।

(8) होली की रात को चंद्रमा की पूजा करने से चंद्रमा के दोषों में आराम मिलता है।

(9) जो लोग क़र्ज़ से परेशान हैं, वे होली की रात को मंगल ऋण मोचन का पाठ करे जल्द ही क़र्ज़ मुक्ति का योग बनेगा।

(10) अगर आप कोई मंत्र सिद्ध करना और फिर उस मंत्र की सिद्धि प्राप्त करना चाहते है तो होली की रात को आप उसे सिद्ध करके सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

(11) होलिका दहन में देशी घी में भिगोई हुई दो लौंग, एक बताशा और एक पान का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए । इससे सुख-समृद्धि बढ़ती है, कष्ट दूर होते हैं।

(12) होली वाले दिन भगवान नृसिंह ओर माता लक्ष्मी की विधिवत तरीके से पूजा एवं पंचामृत का अभिषेक अवश्य करें, इससे सोभाग्य में वृद्धि होती है।

होलाष्टक का ज्योतिषीय महत्व

होली पर्व का एक सबसे अहम हिस्सा है होलाष्टक। ज्योतिषीय पक्ष और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर, यह आठ दिनों तक चलता है। यह अवधि फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शुरू होकर इसका समापन होलिका दहन पूजा के साथ होता है। इस वर्ष होलाष्टक 10 मार्च से शुरू होकर 17 मार्च को होलिका दहन के शुभ मुहूर्त के साथ समाप्त हो जाएगा और होली का उत्सव 18 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी।

ज्योतिषाचार्य के अनुसार, हिंदू धर्म में, इन आठ दिनों को अत्यंत अशुभ माना जाता है क्योंकि यह दिन भक्त प्रह्लाद के उत्पीड़न को दर्शाते हैं। होलाष्टक एक प्रतिकूल अवधि होने के कारण, पौराणिक कथाओं में इस अवधि में यज्ञ, हवन, विवाह, और हिंदू जनेऊ समारोह, आदि जैसे सभी भाग्यशाली कार्यों का निषेध करने का सुझाव दिया गया है। इन दिनों में शुभ समारोह निषिद्ध हैं क्योंकि इस अवधि में सूर्य और चंद्र सहित सभी ग्रह हानिकारक स्थिति में होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन आठ दिनों में ग्रहों की स्थिति एक तरह से स्थायी नकारात्मक प्रभाव आकर्षित कर सकती है। इस अवधि के दौरान, नकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक हानिकारक होती हैं। इसलिए, यह एक ऐसा समय भी है जब कुछ लोग तांत्रिक क्रियाओं और टोटके करते हैं। इसके अतिरिक्त, तांत्रिक विद्या की साधना भी इस अवधि में अत्यधिक सफल होती है।

ज्योतिषाचार्य का कहना है कि इस सन्दर्भ में हमारे पुराणो में काफ़ी कुछ लिखा गया है। पहली कथा के अनुसार प्राचीन समय में, अन्य देवताओं के अनुरोध के बाद, कामदेव ने अपने “प्रेम बाण” के साथ भगवान शिव की तपस्या को भंग कर दिया। इस घटना से क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आँख खोली और कामदेव को जला दिया। इसके बाद, कामदेव के मरणोपरांत, पूरा ब्रह्मांड शोक और दुखों से ढंक गया।

इस पर, कामदेव की पत्नी रति ने अपने पति को पुनर्जीवित करने के लिए ८ दिनों की कठिन तपस्या की। तत्पश्चात, रति की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुन: जीवनदान दिया। इस घटना के बाद, रति की तपस्या के कारण यह आठ दिन अशुभ दृष्टि से याद किये जाते हैं।

इसके साथ, एक और प्रमुख कथा इस प्रकार है- भगवान विष्णु के प्रति अपने पुत्र प्रहलाद की भक्ति से क्रोधित, राजा हिरण्यकश्यप ने उसे आठ दिनों तक अत्यंत यातनाएं दीं। होलिका दहन की घटना से पहले ये आठ दिन होते हैं। इस प्रकार, भक्ति पर हमले के इन आठ दिनों के कारण हिंदू धर्म में इसे अशुभ माना गया है।

होलाष्टक में दान की महिमा का भी काफ़ी गुणगान किया गया है। ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री के अनुसार, नवग्रह इस अवधि में अपने भयंकर रूप में होते हैं। अष्टमी से पूर्णिमा तक, ग्रहों की स्थिति को अशुभ अवधि माना जाता है। इसके अतिरिक्त, यह कहा जाता है कि ग्रहों की ऐसी स्थिति के कारण, लोगो के मन में तनाव हो सकता है। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य समृद्ध परिणाम नहीं देता है। हालाँकि, दान इस अवधि में भी एक समृद्ध कार्य है। होलाष्टक में दान करना और जरूरतमंदों को भोजन अर्पित करने से सौभाग्यशाली परिणाम प्राप्त होते हैं। इन आठ दिनों में दान करने से जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

होलाष्टक पर सभी अनुष्ठान नकारात्मकता ऊर्जा और ग्रहों की नकारात्मक प्रभाव को दूर करने के लिए किए जाते हैं। साथ ही, इस अवसर पर गंगाजल की सहायता से होलिका दहन के क्षेत्र को शुद्ध करना चाहिए। इसके अलावा, लकड़ी के दो स्तंभ और गाय के गोबर के उपले लगाने चाहिए। स्तंभों के इन दो पक्षों को होलिका और प्रहलाद माना जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस दिन के बाद से, लोग लकड़ी और अन्य वस्तुओं को इकट्ठा करना शुरू करते हैं जो वह होलिका में दहन करना चाहते हैं। इसके अलावा, आप लकड़ी के शाखाओं को रंगीन कपड़ों से सजा सकते हैं। यह नकारात्मक ऊर्जाओं को कम करता है। इससे जीवन में प्रसन्नता आती है। होलिका दहन के दिन, कपड़े के इन टुकड़ों को होलिका के साथ जलाया जाता है। इसके अलावा, ये कपड़े नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करते हैं।