
गोंडा। मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने प्रेमिका मुमताज की याद में आगरा में ताज महल का निर्माण कराकर मिसाल कायम की। यहां 18वीं शताब्दी में तत्कालीन गोंडा नरेश गुमान सिंह की पत्नी रानी भगवंत कुंवरि ने राजा को रिझााने के लिए मथुरा वृंदावन के तर्ज पर सागर तालाब के बीचोबीच टापू पर काल्पनिक वृंदावन की स्थापना कर इतिहास रचा। लेकिन शासन प्रशासन की उपेक्षा के चलते राज परिवार की यह अलौकिक निशानी खण्डहर में तब्दील हो गई।
राजा को रिझााने के लिए बनाया काल्पनिक वृंदावन
नगर स्थित सागर तालाब का इतिहास बहुत पुराना है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में गोंडा नरेश शिव प्रसाद सिंह ने कराया था। वह कृष्ण के अनन्य भक्त थे और इसी के समीप भव्य मंदिरों का भी निर्माण कराया था। तत्पश्चात राजा गुमान सिंह की पत्नी रानी भगवंत कुंवरि ने इसे काल्पनिक वृंदावन का रुप दिया। जनश्रृति के अनुसार, रानी भगवंत कुंवरि के पति राजा गुमान सिंह मथुरा वृंदावन दर्शन के लिए गए। वहां का मनमोहक दृश्य उन्हें भा गया और वह वहीं अपने गृरु और सखी के पास रुककर गुरु की सेवा करते रहे। वह वहां से वापस आने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे तब रानी भगवंत कुंवरि ने गोडा मेंभी मथुरा के वृंदावन की भांति एक काल्पनिक वृंदावन स्थापित करने का वचन दिया। तदनुसार 18वीं शताब्दी में रानी भगवंत कुंवरि ने सागर तालाब के मध्य एक टापू पर गोर्वधन पर्वत, कृष्ण कुंज, श्याम सदन, गोपाल बरसाना आदि का निर्माण कराया। जो आज भी सागर तालाब के बीचो बीच खण्डहर के रुप में विद्यमान है।
रखरखाव के अभाव में मिट रही प्रेम की निशानी
गोंडा नरेश महाराजा देवी बख्श सिंह के शासनकाल तक सागर तालाब और काल्पनिक वृंदावन दर्शनीय स्थल रहा किन्तु उनके नेपाल जाने के बाद ब्रिटिश हुकूमत में राजा के इस अद्भुत निर्माण की दुर्गति शुरु हो गई और देखरेख के अाभाव में धीरे-धीरे यह खण्डहर में तब्दील होता गया। आजादी के बाद भी राज परिवार की इस अलौकिक निशानी के संरक्षण का कोई खास प्रयास नहीं किया गया। नतीजन यहां बड़े-बड़े पेड़ और झाड़ियां उग गए और जहरीले जीव जंतुओं ने भी यहां डेरा जमा लिया।
बेनतीजा रही सौन्दर्यीकरण की पहल
गोंडा रियासत द्वारा निर्मित ऐतिहासिक महत्व की एक प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने काल्पनिक वृंदावन और सागर तालाब के सौन्दर्याीकरण के लिए वर्ष 1999-2000 में तत्कालीन जिलाधिकारी मार्कण्डेय सिंह ने प्रथम बार पहल की और 16 लाख 40 हजार की लागत से गोंडा वन प्रभाग के तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी के मुरलीधर राव ने विस्तृत कार्ययोजना तैयार की। इसमें टापू पर ऐतिहासिक भवन मंदिर आदि के मरम्मत पर डेढ़ लाख, टापू की झाड़ी सफाई एवं वृक्षों की डाल आदि कटाई पर 40 हजार, सागर ताल के चारों ओर प्रस्तावित सड़क पर मिट्टी पटाई एवं सीसी रोड के निर्माण पर पांच लाख 85 हजार, सागर ताल में पाइप की रेलिंग और बाउंड्रीवाल के निर्माणपर तीन लाख, सीढ़ि़यों के मरम्मत और सीमेंटेड बेंचों के निर्माण पर एक लाख दस हजार, इक्वेरियम, मछलियों की खरीद तथा ग्रिल,फर्श एवं सोलिंग आदि केनिर्माण पर तकरीबन एक लाख, सागर तालाब बच्चों के मनोरंजन के लिए पैडल बोट क्रय, फइवार बोट की मरम्मत पर दो लाख तथा चिलड्रेन पार्क हेतु आपरोटर्स क्रय के लिए 50 हजार एवं लान के विकास व फूलदार पौधों के लगाने पर 50 हजार रुपए व्यय का प्रावधान किया गया था। तालाब के उत्तर ओर एक प्लेटफार्म का निर्माण शुरु भी कराया गया किन्तु इसी बीच उनका स्थानांतरण हो जाने से योजना ठप हो गई।
इसके तमाम वर्षों बाद जिलाधिकारी डा. रोशन जैकब ने सागर तालाब को अतिक्रमण से मुक्त कराकर चारों ओर मार्ग का निर्माण कराया। उन्होंने टापू की सफाई तो करा दिया किन्तु गोवर्धन पर्वत, श्याम सदन, मंदिर और कृष्ण कुंज के मरम्मत पर जोर नहीं दिया। इसका परिणाम रहा कि ये सब आज भी ज्यों के त्यों बने हुए हैं। उनके द्वारा शुरु कराया गया इक्वेरियम और पैडल बोट, पार्क आदि सभी रखरखाव के अभाव में समाप्त होते गए।
गोंडा नरेश देवी बख्श सिंह साहित्य एवं संस्कृति जागरण समिति ने उठाई मांग
आजादी के सत्तावनी क्रान्ति के महानायक महाराजा देवी बख्श सिंह के पूर्वजों द्वारा स्थापित भवनों, वृंदावन, सागर ताल और जिगना कोट स्थित राजा के महल के ध्वंसावशेष आदि के संरक्षण के लिए राजा देवी बख्श सिंह साहित्य एवं संस्कृति जागरण समिति के मंत्री और महाराजा देवी बख्श सिंह के वंशज माधवराज सिंह ने अनेक बार मांग की। लेकिन शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों द्वारा अनसुनी किए जाने से उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई है।
Published on:
12 Aug 2017 10:35 am
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