
गोरखपुर. अब प्रिंसिपल सर, मैैडम नहीं कैदी नंबर 3120 और 3119 के नाम से जाने पुकारेे जाएंगे बीआरडी मेडिकल काॅलेज के पूर्व प्राचार्य डाॅ.राजीव मिश्र व डाॅ.पूर्णिमा शुक्ला। जीवन भर की कमाई धरी की धरी रह गई फिलहाल जेल की सलाखें ही इनकी नियति है। एक कंबल, एक मग और एक थाली और कुछ जोड़ी कपड़ों के साथ इनको गुजर-बसर करना होगा। खाना भी अन्य कैदियों की भांति ही मिलेगा। नाश्ता और चाय भी इनको मिल सकेगा लेकिन वह भी तयशुदा टाईम पर।
डाॅक्टर दंपत्ति के करीबी बताते हैं कि, रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके पूर्व प्राचार्य के घर में एसी सहित हर सुख-सुविधा मौजूद है। नौकर-चाकर भी पर्याप्त हैं। खाने-पीने से लेकर चाय-नाश्ता, हर चीज की फरमाईश एक झटके में घर हो या आफिस पूरी हो जाती थी। घर में बेड से लेकर बाथरूम तक इस दंपत्ति ने अपनी पसंद से तैयार कराया था। यहां तक की सर्वेंट क्वार्टर में भी एक सामान्य व्यक्ति के रहने के सारे सामान उपलब्ध कराए थे।
लेकिन अब ऐसी कोई सुख-सुविधा इनको नहीं मिल सकेगी। जेल में दोनों अलग-अलग बैरक में रहेंगे। डाॅक्टर राजीव नेहरू बैरक में तो डाॅक्टर पूर्णिमा महिला बैरक में रहेंगी। आरामदायक बेड़ की जगह इनको जेल के गंदे फर्श पर ही न जाने कितनी रातें गुजारनी होगी। नरम गद्दों की जगह बिछाने के लिए एक खुरदुरा कंबल होगा। नफासत के साथ अब डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना नसीब नहीं होगा बल्कि जेल में मिली थाली में ही खाकर गुजारा करना होगा। यहां उनकी जूठी थाली या गिलास धोने वाला कोई नौकर नहीं होगा बल्कि खुद ही उसे साफ करना होगा। यहां कोई ऐसा नौकर भी नहीं होगा जो मैडम या साहब कहकर यह पूछे कि आज नाश्ते में क्या बनेगा या लंच व डिनर में क्या लेंगे। जो कुछ मिलेगा वह जेल के मैनुअल में पहले से तय है कि किस दिन क्या कैदियों के लिए बनेगा।
संभव है वहां मौजूद कैदियों में कोई डाॅक्टर साहब कहकर संबोधित करे लेकिन जेल में जब पुकार होगा तो इनको कैदी नंबर 3119 और 3120 के नाम से ही पुकारा जाएगा। अब सर या मैडम का सम्मान विरले ही यहां किसी से मिल सके।
पूर्व प्राचार्य को सलाखों के पीछे पहुंचाने में भी स्त्री का हाथ !
कहावत है कि हर पुरूष की सफलता के पीछे एक स्त्री होती है। इस कहावत के उलट भी कई कहानियां सामने आती हैं। इनदिनों चर्चा में आये बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य का मामला ही ले लें तो साफ़ हो रहा कि डाॅ.राजीव मिश्र को सलाखों के पीछे पहुंचवाने में भी एक स्त्री का ही योगदान है। मेडिकल काॅलेज में आमचर्चा पर यकीन करें तो पूर्व प्राचार्य डाॅ.राजीव मिश्र की पत्नी डाॅ.पूर्णिमा शुक्ला का मेडिकल काॅलेज के हर निर्णय में दखल होता था। यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व प्राचार्य की पत्नी ही कमीशन संबंधी डील करती थी। इसी का नतीजा रहा कि आक्सीजन सप्लायर के भुगतान में देरी हुई और जिसकी परिणिती बच्चों की मौत के रूप में सामने आई। पत्नी की एक इस दखलंदाजी ने एक प्रतिष्ठित डाॅक्टर को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। जिस सुकून और आराम के लिए उन्होंने पूरा जीवन मेहनत किया अब वह भी छीन चुका है।
गोरखपुर से धीरेंद्र विक्रमादित्य गोपाल
Published on:
01 Sept 2017 03:44 pm
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