
जानिए उस मुख्यमंत्री की कहानी जिसने गुरु-शिष्य परंपरा को एक नई उंचाई दी
गुरु पूर्णिमा (Guru Purniama) सदियों से चली आ रही सनातन परंपरा की पवित्र यात्रा है। यह दिन अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रस्तुति का दिन माना गया है। माना जाता है कि हर व्यक्ति के जीवन में गुरु का प्रभाव होता है जो उसके व्यक्तित्व को निखारने में सहभागी रहा है। भारतीय संस्कृति में तो गुरु-शिष्य की तमाम कहानियां सदियों से अजर अमर रही हैं। नाथ संप्रदाय ( Nath Sampraday) में गुरु-शिष्य परंपरा का तो बेहद पवित्रता एवं तन्मयता के साथ निर्वहन का इतिहास रहा है। इस परंपरा को सुदृढ़ करने में गोरखनाथ मंदिर (Gorakhnath Mandir)का विशेष स्थान है। ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ (Mahant Avedyanath)व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) भी उसी गुरु शिष्य परंपरा के शिखर पुरुष हैं जिन्होंने इस परंपरा को और पवित्र किया।
बेहद कम उम्र में ही महंत अवेद्यनाथ के संपर्क में आए थे योगी
गोरक्षनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ और उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ उस गुरु-शिष्य परंपरा के हैं जिनके शिष्य ने अपने गुरु की हर इच्छाओं को पूरा करते हुए उनकी मान-प्रतिष्ठा को और आगे बढ़ाने का काम किया। यह गुरु अवेद्यनाथ ही थे जिन्होंने अपने शिष्य योगी आदित्यनाथ को राजनीति के शिखर पर पहुंचाने में मदद की।
गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ जब महंत अवेद्यनाथ के संपर्क में आये तो उनकी उम्र बेहद कम थी। गुरु के संपर्क में आते ही उनको अपनी सेवा से लगातार प्रभावित करते रहे।
गुरु ने भी शिष्य योगी आदित्यनाथ में नेतृत्व के गुणों को पारखी नजर से पहचान लिया और आगे बढ़ाने में हर संभव सहयोग किया। यह योगी आदित्यनाथ का सेवाभाव ही रहा कि तत्कालीन पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ ने उनको अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
उत्तराधिकारी घोषित करने के बाद गुरु ने ही शिष्य को तराशा
एक गुरु अपने शिष्य को प्रेरित करता है, उसे मुश्किल से मुश्किल घड़ी का मुकाबला करने के लिए प्रशिक्षित करता है। गुरु ही ऐसा है जो अपने शिष्य को तराश कर जीवन में सफल कर सकता है। गुरु महंत अवेद्यनाथ ने भी जीवनकाल में ही योगी आदित्यनाथ को तराश कर अजेय बना दिया। उत्तराधिकारी घोषित होने के बाद मंदिर से लेकर महंत अवेद्यनाथ की राजनीतिक गतिविधियों का संचालन स्वयं योगी आदित्यनाथ करने लगे। गुरु को लगा कि अब राजनीति में योगी आदित्यनाथ को स्थापित करने का समय आ गया है तो उन्होंने स्वयं ही 1998 में अपनी सीट छोड़ दी।
महंतजी ( Mahant Avedyanath) ने राजनीति से संन्यास ले लिया और अपने सबसे प्रिय शिष्य ( Yogi Adityanath) राजनीति का उत्तराधिकारी बना दिया। यहीं से योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पारी शुरू हुई है। 1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ संसद पहुंचे तो वह सबसे कम उम्र के सांसद थे, वो 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने। 1998 से लगातार पांच बार योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के अजेय सांसद बने।
सांसद से सूबे की मुखिया तक का तय किया सफर
गुरुओं का आशीर्वाद ही रहा कि गुरु गोरक्षनाथ पीठ ( Guru Gorakhnath Mandir and Politics) राजनीति का भी सबसे बड़ा शक्ति केंद्र बनकर उभरा। बीजेपी ने 2017 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद यहां के पीठाधीश्वर व पांच बार के अजेय सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद का सबसे उपयुक्त चेहरा मानते हुए उनको सूबे की कमान सौंपी। 2017 में योगी आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री बनें। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर संसदीय सीट रिक्त हुई। लेकिन यह सीट बीजेपी जीत न सकी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद चुनाव की कमान संभाली तो यहां भेजे गए अभिनेता रविकिशन भारी मतों से चुनाव जीत ली।
कभी भी गोरखपुर में आते हैं तो गुरुओं का आशीर्वाद सबसे पहले लेते
सूबे की कमान संभालने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) को अधिकतर समय बाहर ही रहना पड़ता है। लेकिन समय समय पर वह गोरखपुर आते रहते हैं। देश के बड़े राज्य का मुखिया होने के बाद भी उन्होंने कभी परंपराओं ( Guru Shishya) का साथ नहीं छोड़ा। योगी आदित्यनाथ मंदिर, राजनीति, समाजसेवा समेत सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के बावजूद अपनी गुरु की सेवा करने में कभी कोई चूक नहीं किया। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद सपनों को पूरा करने के साथ गुरु-शिष्य परंपरा (Guru Purniama) को निभा रहे। सीएम योगी आदित्यनाथ जब भी गोरखपुर आते हैं तो सबसे पहले गोरखनाथ मंदिर पहुंचकर अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते हैं इसके बाद ही कोई काम करते हैं। यह गोरखपुर प्रवास के दौरान उनके कार्यक्रम में शुमार होता है।
अजेय विधायक रहे महंत अवेद्यनाथ राममंदिर आंदोलन के रहे प्रणेता
महंत अवेद्यनाथ आैर उनके गुरु महंत दिग्विजयनाथ ने सबसे पहले राजनीति की शुरूआत की थी। राममंदिर आंदोलन का केंद्र रह चुके गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ गोरखपुर के सांसद रह चुके हैं तो उनके शिष्य महंत अवेद्यनाथ कर्इ दशक तक विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचे। महंत दिग्विजयनाथ के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद वह उपचुनाव में जीतकर संसद में पहुंचे लेकिन एक चुनाव में हार के बाद वह फिर विधानसभा चुनावों में ही शिरकत करते रहे। 1989 में महंत अवेद्यनाथ ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सिंबल पर गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में मैदान में उतरे आैर भारी मतों से विजयी हुए। राममंदिर आंदोलन का अगुवा रहे महंत अवेद्यनाथ अगला चुनाव बीजेपी के सिंबल पर लड़े आैर फिर जीते। जीत की हैट्रिक बनाने के बाद उन्होंने अपनी सीट उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को सौंप दी।
Published on:
16 Jul 2019 02:31 pm
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