22 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जागो जनमत: खामोश मतदाता उठाने को हैं तूफान, इस बार बदल देंगे सारे समीकरण

युवा को चाहिए रोजगार, महिलाओं को सुरक्षा की दरकार। राष्ट्रवाद और जातीवाद पर विकास का मुलम्मा चढ़ाकर नेता नहीं बटोर पाएंगे वोट।

6 min read
Google source verification

image

Mohd Rafatuddin Faridi

Nov 22, 2016

jago janmat campaign

jago janmat campaign

गोरखपुर. यूपी में जस-जस ठण्ड बढ़ रही है तस-तस सियासी पारा भी चढ़ रहा है। हर पार्टियां अपने-अपने समीकरण सेट करने में जुट गई हैं। मंच और टीवी चैनलों पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो चुका है। राष्ट्रवाद और जातीवाद को विकास का मुलम्मा चढ़ाकर नेता जनता को बहकाकर पांच साल के लिये अपनी सीट पक्की करने में जुटे हैं। क्षेत्र में कभी-कभार दिखने वाले नेताजी गांव-गांव खाक छानने में लगे हैं। एक से एक महंगी लग्जरी गाड़ी आम आदमी के दरवाजे पर आ रही है। जनसभाएं हो रही, जनता के दिलों में उतरने की कोशिशें हो रही। पर शायद नेताओं का यह चुनावी हथकण्डा काम न आए, क्योंकि इस बार जनमत जाग गया है। पत्रिका ने गोरखपुर के शहर में जब लोगों से जब यह जानने की कोशिश किया कि इस बार उनका इरादा क्या है, वो कौन से मुद्दे हैं जो उनके वोटों को प्रभावित करेंगे। कौन सी समस्याएं, जिसके बारे में उन्हें लगता है कि पांच साल बीतने को है पर उसके समाधान के लिये प्रयास नहीं किया गया। पत्रिका को लोगों से जो जवाब मिले वह नेताओं के लिये खतरे की घण्टी से कम नहीं, खासतौर से उन नेताओं के लिये जो अभी से जीत का ढिंढोरा पीट रहे हैं या फिर इसका खयाल दिल में पाले हुए हैं। बातचीत में महिलाओं, युवाओं, शिक्षकों और दूसरे वालों ने बेबाकी से अपनी प्राथमिकताओं को गिनाने के साथ समस्याओं की ओर ध्यान खींचा।



युवाओं को चाहिये रोजगार और करप्शन मुक्त समाज
युवा कैरियर को लेकर परेशान हैं तो समाज के प्रति भी सचेत। वह चाहता है कि रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों। हर किसी को दो जून की रोटी मिल सके। समाज से करप्शन का नामोनिशां मिटे और क्षेत्र का विकास हो। युवा भारती के अध्यक्ष अविजित मिश्र का कहना है कि विकास के लिए प्राइवेटाइजेशन जरूरी है। इससे रोजगार भी बढ़ेगा और करप्शन भी कम होगा। मिथिलेश सोनकर का कहना है कि निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम लगाई जानी चाहिए। वह फीस के नाम पर मनमानी करते हैं। इसके लिए सरकारी हस्तक्षेप को जरूरी बताया। सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों का अकांउट भी सार्वजनिक हो ताकि करप्शन खत्म हो सके। उग्रसेन सिंह, हर्सित मल्ल, आदित्य चैबे, अश्विनी, अरूण गौतम, दीपक कुशवाहा, दुर्गेश कुमार, रामकुमार, निर्भय, सतीश, सुनील आदि ने विभिन्न समस्याएं गिनायीं।



युवाओं की प्राथमिकताएं
- रोजगार के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो
- शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित हो
- शिक्षा ऐसी हो जो रोजगार देने में सहायक हो
- करप्शन खत्म करने के लिए सरकार आगे आए
- सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के बैंक अकांउट, हैसियत सार्वजनिक हो
- शिक्षा की असमानता दूर की जाए, एक समान शिक्षा प्रणाली लागू हो
- यह सुनिश्चित हो कि सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो रही
- प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच असमानता दूर हो।
- आईसीएससी, सीबीएसई और यूपी बोर्ड अलग-अलग हैं इनको खत्म कर एक बोर्ड बनाया जाए



सुरक्षा और समानता चाहती है आधी आबादी
आधी आबादी की जब भी बात होती है तो सबसे अहम मुद्दा उनकी सुरक्षा ही होती है। आजादी मिले इतने साल होने के बावजूद हम इतना भी नहीं कर पाए कि बहू-बेटियां सुरक्षित रहें। क्यों ऐसे इंतजामात नहीं किए जाते कि वह भी सबकी तरह सड़कों पर सुरक्षित चल सके, अपना काम बिना डर के कर सके। पत्रिका ने जब मंच दिया तो महिलाओं ने बेबाकी से अपनी बात रखी। शिक्षिका अनुराधा मिश्र ने कहा कि महिलाओं को पुरूषों की तरह समानता का अधिकार मिलना चाहिए। समाज कितना भी तरक्की कर ले आज भी महिला को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है। गृहणी सरस्वती पांडेय ने सुरक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि महिलाएं आज भी असुरक्षित हैं यह इसलिए कि आरोपी को सजा ही नहीं मिलती। निर्भया कांड में भी यही हुआ। जबतक कड़ी सजा नहीं मिलेगी तबतक हम असुरक्षित रहेंगे। अर्चना मिश्र ने कहा कि रावण जब सीता को लेकर गया था तो उसे माफ नहीं किया गया था लेकिन आज महिला पर अत्याचार करने वालों को छोड़ दिया जा रहा। उन्होंने कहा कि चुनाव में हम केवल वोटबैंक समझे जाते। हमारी भी राजनैतिक भागीदारी होनी चाहिए। समाजसेवी मीनाक्षी राय ने कहा कि नारी सुरक्षा केवल आश्वासन न रहे। योजना बने तो लागू हो। महिला अगर चुनी जाती है तो उसे काम करने दिया जाए न कि उनके पति-बेटे काम करें। अनीता मालवीय ने कहा कि महिला को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। बातचीत में अनन्या, रजनी यादव, मोहित, आरती, साक्षी आदि ने भी अपनी बात रखी।



महिलाओं की प्राथमिकताएं
- महिलाओं को समानता का अधिकार मिले, महिला होने के नाते कोई काम करने से न रोका जाए
- महिला को सुरक्षित माहौल मिले
- महिला अत्याचार करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिले
- बलात्कार के आरोपियों को माफ न किया जाए न ही सजा कम हो
- सरकार सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित करे
- महिलाओं को सशक्त बनाया जाए, आत्मनिर्भर किया जाए
- महिलाओं को राजनीति में बराबर का अधिकार मिले
- चुनाव में भी महिलाओं को प्रत्याशी बनाया जाए
- चुनी हुई महिला जनप्रतिनिधियों को काम करने दिया जाए, उनके पति-पुत्र या प्र्रतिनिधि काम न करे
- सड़कों पर रात में महिला भी सुरक्षित आ जा सके ऐसा माहौल सुनिश्चित हो
- रूढ़ियों को खत्म किया जाए ताकि महिलाओं को भी स्वतंत्रता मिल सकेे
- महिला हेल्पलाइन ठीक से काम नहीं करता



शिक्षा का बाजारीकरण बंद हो, तय हो जवाबदेही
शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक यूं ही नहीं कहा गया। वह समाज को आगे ले जाने का काम करता है तो जरूरत पड़ने पर सरकार को आइना दिखाने का भी काम करता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों में स्थितियों में काफी बदलाव आए हैं। शिक्षक खुद की समस्याओं से घिरा हुआ है। वह समाज के प्रति चिंतित तो है लेकिन अपने शिक्षक समाज की समस्याओं से भी परेशान। पत्रिका जनमत में शिक्षकों से बातचीत हुई तो शिक्षा के निजीकरण सहित विभिन्न समाजिक मुद्दों पर उनका दर्द उभर कर सामने आया। शिक्षक डॉ. राजेश चंद्र मिश्र का कहना है कि शिक्षा का बाजारीकरण समाज के लिए सबसे घातक है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए थी जो रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए लेकिन इसका बाजारीकरण हो गया। देश की अर्थव्यवस्था खेती-किसानी पर टिकी है लेकिन इससे रोजगार के अवसर उत्पन्न हो कोई ध्यान नहीं दिया, आलम पलायन। महानगरों में लोग कीड़े-मकोड़े की तरह रहकर रोजी-रोटी कमा रहे और गांव वीरान है। यह इसलिए क्योंकि खेती रोटी उपलब्ध कराने में अक्षम साबित हो रही। डॉ. एसएन शर्मा ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। तमाम ऐसी शिक्षण संस्थाएं हैं जो सरकारी धन से चलती हैं लेकिन पूरा कमांड प्रबंधकध्प्रबंधतंत्र का होता। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती। देश में जो भी सरकारी योजनाएं लागू हो उसमें संबंधित की जवाबदेही तय हो तभी इस देश का विकास होगा, समस्याओं का समाधान होगा। इस चर्चा में डॉ. सुबोध कुमार, विमलेश सिंह, अरूण कुमार, अमित कुमार, योगेश आदि ने भी प्राथमिकताएं गिनाई।



शिक्षकों की प्राथमिकताएं
- शिक्षा का बाजारीकरण बंद हो
- गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा को बढ़ावा मिले
- शिक्षकों की समस्याओं के निस्तारण के लिए सरकारें ध्यान दे
- राजनैतिक दलों को भी आरटीआई के दायरे में लाया जाए
- सिटीजन चार्टर को कड़ाई से लागू किया जाए
- गांव के पलायन को रोकने के लिए खेती-किसानी आधारित रोजगार के अवसर उपलब्ध कराई जाए
- सरकारी साहबान की जवाबदेही तय की जाए ताकि योजनाओं का लाभ आमजन को मिल सके
- किसान तय करे उसके उत्पाद की कीमत कितनी होनी चाहिए
- आरटीआई को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और सूचना न देने वाले पर सेवा समाप्ति तक का दंड सुनिश्चित कियाजाए।

संबंधित खबरें




राजनैतिक दलों की फंडिंग पर कसे शिकंजा
सरकार और जनप्रतिनिधियों से सबकी अपेक्षाएं हैं। हर कोई समाज की बेहतरी का जज्बा मन में सोचे हुए है। तमाम ऐसी समस्याएं हैं जिनका निदान ही समाज की बेहतरी का रास्ता प्रशस्त कर सकता है। पत्रिका की चर्चा में समाजिक रूप से सक्रिय लोग, समाज को बहुत ही बारीकी से देख चुके बुजुर्गों ने एक से बढ़कर एक सुझाव दिए और उन समस्याओं की ओर ध्यान खींच जो विकास की गति सुस्त करने की प्रमुख वजह हैं। राजनैतिक कार्यकर्ता व डीडीयू के पूर्व महामंत्री राजेश कुमार तिवारी का कहना है कि सारी समस्याओं का निदान चुनाव आयोग के पास है। अगर इलेक्शन रिफार्म कर धनबल-बाहुबल पर रोक लग जाए तो 80 प्रतिशत समस्या दूर हो जाएगी। आज आम आदमी चुनाव नहीं लड़ पा रहा क्यों। राजनैतिक दलों की फंडिंग समाप्त की जाए। चुनाव आयोग सबको चुनाव लड़ाए। वह फंडिंग करे। राजनैतिक दल आरटीआई के दायरे में आए। यह बताया जाए कहां-कहां से चंदा आ रहा। सेवानिवृत्त इंजीनियर आरके सिंह ने कहा कि सबकी जवाबदेही तय हो। हर काम के लिए एक निश्चित समय सीमा तय हो, उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही तय हो। योगेश चंद्र ने कहा कि जिस तरह सरकारी नौकरी में आने वालों के लिए तमाम जांच-पड़ताल किया जाता है उसी तरह नेताओं का भी वेरीफिकेशन होनी चाहिए। अमित सिंह ने कहा कि सबसे पहले राजनीति का शुद्धिकरण हो। समाज की आधी समस्या खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। चर्चा में सरोज कुमार, मोहम्मद आलम, महबूब अली, अखिलेश सिंह, सौरभ कुमार, निखिलेश सिंह आदि ने भी विचार रखे।



बुजुर्गों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्राथमिकताएं
- राजनैतिक दलों की फंडिंग खत्म हो
- आरटीआई के दायरे में आएं राजनीतिक दल
- चुनाव आयोग प्रत्याशियों के खर्चे भी खुद करे
- राजनैतिक व्यक्तियों का भी आईएएसध्पीसीएस या अन्य सेवा में चयनित होने वाले अभ्यर्थियों की भांति हो वेरीफिकेशन
- कानून या योजनाएं जो भी लागू हो उसके लिए संबंधित की जवाबदेही भी सुनिश्चित हों
- बुजुर्गों को भी सामाजिक संरक्षण मिले
- पेंशन राशि बढ़ाई जाए
- थानों या अन्य सरकारी दफ्तरों में बुजुर्गों की त्वरित सुनवाई हो