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…तो आरूषि तलवार की तरह ही उलझी रहेगी जया के हत्या की गुत्थी

आखिर हत्या के बारह दिन बाद भी पुलिस के हाथ क्यूं खाली हैं

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JAYA MURDER MYSTERY

हत्या की गुत्थी

गोरखपुर. उत्तर प्रदेश पुलिस का राज यानी सच्चा समाजवाद। नोएडा में आरुषि तलवार का हाइ-प्रोफाइल हत्‍याकांड रहा हो या गोरखपुर में मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की नाक के ठीक नीचे आज से बारह दिन पहले हुआ एक 'मामूली' मर्डर, यूपी पुलिस सबके साथ बराबर इंसाफ़ बरतती है। कोई भेद नहीं करती।

यही वजह है कि नौ साल में आरुषि हत्‍याकांड का मुकदमा जहां अढ़ाई कोस भी नहीं चल पाया, वहीं एक बुजुर्ग चिकित्‍सक अपनी बेटी के कथित हत्‍यारों को सज़ा दिलवाने के लिए सहजनवा से गोरखनाथ थाने तक सात कोस की दूरी तय कर-कर के थक चुकी है।

बीते 4 अक्‍टूबर की सुबह जया (40) की लाश गोरखनाथ थानांतर्गत एक सार्वजनिक शौचालय से लगे कमरे में पाई गई थी। कमरा उसके पिता शेषनाथ पांडे का है जो शौचालय चलाते हैं। वे अपनी पत्‍नी डॉ. संध्‍या पांडे से अलग होने के बाद बीते करीब ढाई दशक से इसी कमरे में रह रहे थे जहां उनकी बेटी का 20 किलोमीटर दूर सहजनवा स्थित अपनी मां के क्‍लीनिक से आना-जाना था। लाश मिलने की सूचना के बाद डॉ. पांडे सदमे में चली गईं। मामले में दो तहरीर दिए जाने के बाद किसी तरह आइपीसी की धारा 302 के तहत एफआइआर हुई। जया की मां द्वारा दी गई तहरीर में नामजद पांडे और जया के बचपन के एक दोस्‍त राकेश के नाम एफआइआर से गायब हैं।

अज्ञात हत्‍यारों पर एफआइआर दर्ज कर के यूपी पुलिस ने हत्‍या के एक संगीन मामले को अधर में लटका दिया है। एफआइआर के बाद डॉ. पांडे समेत परिवार के कुल चार लोगों के बयानात दर्ज किए गए जिसमें चारों ने पांडे और राकेश पर हत्‍या का संदेह ज़ाहिर किया।

पोस्‍ट-मॉर्टम के वक्‍त दी गई पहली तहरीर के दौरान सदमे में होने के कारण डॉ. पांडे ने किसी पर शक़ नहीं जताया था, लेकिन 6 अक्‍टूबर को दी दूसरी तहरीर में पूरे होशो-हवास में उन्‍होंने पांडे और राकेश का नाम लिया। एफआइआर 8 अक्‍टूबर को हुई, लेकिन उसे पहली तहरीर पर आधारित कर दिया गया।

जया का एक बेटा है जो नौवीं में पढ़ता है। वह अपने पति से अलग होकर मां और बेटे के साथ सहजनवा में ही रहती थी और पिता से मिलने कभी-कभार गोरखनाथ जाया करती थी। करीब डेढ़ महीने पहले उसकी मां को पांडे की गतिविधियों पर संदेह हुआ था। तब उन्‍होंने महिला थाने में एक शिकायत दर्ज करवायी थी। शिकायत के बाद पांडे ने थाने आकर लिखित में दिया था कि वे अपनी बेटी को अब कभी अपने पास नहीं बुलाएंगे। 4 अक्‍टूबर को लाश पांडे के परिसर से ही बरामद हुई।

शनिवार को डॉ. संध्‍या पांडे पोस्‍ट-मॉर्टम रिपोर्ट लेने थाने गई थीं। उन्‍हें यह कहकर लौटा दिया गया कि रिपोर्ट नहीं आई है। जया की छोटी बहन ऋचा के मुताबिक काफी अनुरोध करने पर उन्‍हें थाने में पोस्‍ट-मॉर्टम रिपोर्ट दिखायी गई थी। यह 11 अक्‍टूबर की बात है। उसमें दम घुटने से मौत बताई गई है और एंटी-मॉर्टम इंजरी यानी मौत से पहले चोट का जि़क्र है। एंटी-मॉर्टम चोट का मतलब होता है मौत से पहले दिया गया ज़ख्‍म। इसी आधार पर ऋचा कहती हैं कि उनकी बड़ी बहन की हत्‍या की गई है। पुलिस ने अब तक किसी को मामले में गिरफ्तार नहीं किया है।

आज जया का जन्‍मदिन है। वह जिंदा होती तो 40 साल के होने का उत्‍सव मना ही होती, लेकिन विडंबना है कि कल उसकी तेरही होगी। उसकी मां के पास फिलहाल कोई सहारा नहीं है क्‍योंकि दिल्‍ली में रहकर नौकरी करने वाली उनकी छोटी बेटी वापस जा चुकी है। उधर गोरखपुर में यह हत्‍या 11 दिन बीतने के बाद भी ख़बर नहीं बन सकी है।

शहर के बीचोबीच एक सार्वजनिक स्‍थल पर दिनदहाड़े पाई गई लाश की किसी ने भी सुध लेने की कोशिश नहीं की है। दिलचस्‍प यह है कि जिन दो व्‍यक्तियों पर पूरे परिवार ने शक जताया है, वे बयान देकर आज़ाद घूम रहे हैं क्‍योंकि 302 की एफआइआर ''अज्ञात'' लोगों के खिलाफ़ है।

जया की छोटी बहन ऋचा कहती हैं, ''मुझे लगता है कि इस मामले में पुलिस-प्रशासन पर कोई दबाव है। आखिर एफआइआर को नामजद क्‍यों नहीं किया गया जबकि तहरीर और बयान दोनों में नाम लिए गए हैं?" गोरखपुर शहर में रहने वाले डॉ. पांडे के एक पुराने परिचित कहते हैं, ''कुछ कोशिश की जा रही है कि कैसे एफआइआर को दुरुस्‍त करवाया जाए, पुलिस अधिकारियों से मिलकर कुछ बात की जाए लेकिन लगता है कि दिवाली के बाद ही कुछ हो पाएगा। अभी तो योगीजी दो दिन तक शहर में हैं और पूरा अमला उनकी आमोदरफ्त में जुटा है।''

यूपी पुलिस की इसी कार्यशैली का शिकार आरुषि और उसके माता-पिता को होना पड़ा है। अगर आरुषि की हत्‍या के बाद मौका-ए-वारदात की कायदे से तफ्तीश कर ली गई होती तो आज नौ साल बाद मामला ढाक के तीन पात न होता, न ही तलवार दंपत्ति को सामाजिक शर्मिंदगी झेलनी पड़ती। सवाल उठता है कि जब नोएडा में हुआ इतना हाइ-प्रोफाइल क़त्‍ल बिना इंसाफ़ के लटका पड़ा है, तो मुख्‍यमंत्री के क्षेत्र गोरखपुर में हुए एक 'मामूली' मौत की परवाह किसे है।

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