
प्रदेश में मंत्री,विधायक और नेता करते रहे दिखावा,अपने अपने क्षेत्रों में ही नहीं बढ़वा पाए वोटिंग प्रतिशत
धीरेंद्र विक्रमादित्य गोपाल
भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली के नाम पर अस्तित्व में आए कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र देश की मिजाज के साथ हमेशा ही खड़ा रहा है लेकिन सरकारों ने यहां के साथ न्याय करने में हमेशा कोताही बरती। जेपी आंदोलन हो या जनता लहर, राममंदिर आंदोलन हो या मोदी को देश का सिरमौर बनाने का अभियान कुशीनगर की जनता ने सबके साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने का काम किया लेकिन सत्ता का सिंहासन हासिल करने के बाद रहनुमाओं ने इस क्षेत्र का साथ छोड़ने में कोई संकोच नहीं किया। अभी 2014 के लोकसभा चुनाव की ही बात है मतदान के कुछ ही दिन पहले पीएम मोदी ने गन्ना किसानों की दुखती रग पर हाथ रखते हुए चीनी मिल को 100 दिन के भीतर चलवाने का आश्वासन दिया लेकिन पांच साल बीतने पर भी गन्ना किसान खुद को छला महसूस कर रहा।
पडरौना संसदीय क्षेत्र 2009 में हो गया कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र
2008 के परिसीमन के बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में पडरौना संसदीय क्षेत्र का नाम बदल गया। पडरौना लोकसभा क्षेत्र का नाम तो बदलकर कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र हो गया लेकिन नाम के साथ इस क्षेत्र का भाग्य नहीं बदल सका। कभी जंगल पार्टी के आतंक का शिकार रहे इस क्षेत्र में बाढ़, चीनी मिल का न चलना, रोजगार के लिए पलायन प्रमुख समस्याओं में से एक है।
पांच विधानसभा क्षेत्र है कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र में
कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र कुशीनगर विधानसभा क्षेत्र, पडरौना, खड्डा, हाटा और रामकोला सुरक्षित है। पांचों विधानसभाओं पर भाजपा और सहयोगी दल रहे सुभासपा का कब्जा रहा। पडरौना से काबीना मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य विधायक हैं तो कुशीनगर से रजनीकांत मणि, हाटा से पवन केडिया तो खड्डा से जटाशंकर त्रिपाठी। रामकोला सुरक्षित से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के रामानंद बौद्ध विधायक हैं।
विकास के नाम पर केवल दावे, आज भी विकास की बाट जोहता क्षेत्र
कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने की वजह से देश ही नहीं दुनिया के सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। पर्यटन की दृष्टि से काफी उर्वरा क्षेत्र है। महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने के साथ साथ करीब बीस किलोमीटर दूर इसी जिले में पावानगर में महावीर स्वामी से जुड़े स्थल भी है। पास के ही रामकोला क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध अनुसूइयां मंदिर है जहां दुनिया के सारे देवी-देवताओं के अलावा महापुरुषों के चित्र/प्रतिमाएं देखने को मिल सकती है। पवित्र बांसी नदी इसी क्षेत्र में है। यह क्षेत्र हर धर्म के मानने वालों की पवित्र स्थलियों को संजोए हुए है लेकिन रहनुमाओं ने इन जगहों के विकास की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।
मुख्यालय को आज भी लंबी दूरी की ट्रेनों का इंतजार
कप्तानगंज-थावे रेल खंड जब बड़ी लाइन में तब्दील किया जा रहा था कि जनपदवासियों को कई रेलगाड़ियों का तोहफा मिल सकेगा। क्षेत्र के लोग जो अपनी रोजी रोटी के लिए बाहर कमाने जाते हैं उनके आने-जाने की दिक्कतों से निजात के लिए लंबी दूरी की ट्रेनें चल सकेगी। दो-दो सरकारों को यहां के लोगों ने देख लिया किसी ने यहां के लोगों की उम्मीद को पूरा नहीं किया। कुशीनगर जनपद मुख्यालय पडरौना से एक-दो ट्रेन जो है भी उनकी टाइमिंग इतनी बेतरतीब है जिससे सफर कर आप अपना काम समय से नहीं कर सकते हैं।
बुद्ध स्थली को एक अदद रेलमार्ग की जरूरत
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बुद्ध महापरिनिर्वाण भूमि पर लाखों देशी-विदेशी सैलानी हर साल आते हैं। लेकिन आजाद भारत की सरकारों ने कुशीनगर को रेल लाइन से जोड़ने की ईमानदारी से पहल तक नहीं की। दशकों से कुशीनगर को रेल लाइन से जोड़ने के लिए सरकार में बैठे लोग दावों के साथ आश्वासन तो देते रहे लेकिन उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।
इंटरनेशनल एयरपोर्ट का भी सपना अधूरा
2007 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने बुद्धस्थली को इंटरनेशनल एयरपोर्ट का तोहफा दिया। केंद्र सरकार ने भी एयरपोर्ट की राह की अड़चनों को खत्म किया। बसपा सरकार में एयरपोर्ट की जमीन के अधिग्रहण की ही कवायद हो सकी। बाद में आई अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार में इंटरनेशनल एयरपोर्ट अमलीजामा पहनने लगा। करीब 190 करोड़ रुपये की किश्त एयरपोर्ट निर्माण के लिए जारी हुई। भूमिपूजन के बाद निर्माण शुरू हुआ। लेकिन नई सरकार में काम ठप पड़ा हुआ है। धनाभाव में एयरपोर्ट का सपना पूरा नहीं हो सका है।
पडरौना चीनी मिल चलवाने का पीएम का भी वादा निकला झूठा
कुशीनगर जिला का किसान गन्ना की खेती पर निर्भर है। जिला मुख्यालय की पडरौना चीनी मिल और कठकुईयां चीनी मिलों के बंद हो जाने के बाद पडरौना क्षेत्र का गन्ना किसान बेहाल है। कांग्रेस की सरकार करीब दस साल रही। पांच साल यहां के कांग्रेस से सांसद आरपीएन सिंह मनमोहन सरकार में मंत्री रहे लेकिन पडरौना चीनी चलवाने का सपना पूरा नहीं कर सके। 2014 में पडरौना में चुनावी जनसभा करने पीएम नरेंद्र मोदी पहुंचे। उन्होंने मंच से तत्कालीन केंद्रीय मंत्री व कुशीनगर से कांग्रेस प्रत्याशी को आड़े हाथों लिया और पडरौना चीनी मिल नहीं चलने की नाकामी को मुद्दा बनाया। गन्ना किसानों ने मोदी का जबर्दस्त समर्थन किया। बीजेपी की सरकार बनीं, पडरौना का किसान खुश था कि चीनी मिल चलवाने की पहल पीएम मोदी करेंगे। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद नरेंद्र मोदी पडरौना फिर आए लोग इस उम्मीद में पहुंचे कि वह चीनी मिल पर कोई ऐलान करेंगे लेकिन पूरे भाषण के दौरान उन्होंने चीनी मिल का जिक्र तक नहीं किया। पांच साल बाद फिर चुनाव हो रहे और किसान नाउम्मीद हो चुका है।
बीजेपी और सपा ने बदले प्रत्याशी तो कांग्रेस ने पुनः जताया भरोसा
कुशीनगर लोकसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी ने निवर्तमान सांसद राजेश पांडेय उर्फ गुड्डू का टिकट काटकर 2017 में कांग्रेस से भाजपा में आए विजय कुमार दुबे पर दांव लगाया है। समाजवादी पार्टी ने भी यहां प्रत्याशी बदलते हुए एनपी कुशवाहा को प्रत्याशी बनाया है। जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री आरपीएन सिंह को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा प्रत्याशी विजय कुमार दुबे को ब्राह्मण वोटरों के अलावा मोदी फैक्टर पर भरोसा है तो महागठबंधन की ओर से उतरे सपा प्रत्याशी एनपी कुशवाहा को सजातीय वोटरों के अलावा यादव-मुस्लिम, दलित के साथ की आस है। कांग्रेस प्रत्याशी आरपीएन सिंह अपने सजातीय कुर्मी-सैंथवार वोटरों के साथ मुसलमानों का अधिक से अधिक वोट बटोरने की जुगत में हैं। कांग्रेस की नजर यादव व दलित वोटरों पर भी है।
यहां सबको मिला सांसद बनने का मौका, बसपा रह गई पीछे
कुशीनगर जिला पहले देवरिया जिले का हिस्सा हुआ करता था। पहले आम चुनाव में देवरिया में तीन सीटें थी, देवरिया दक्षिणी, देवरिया पश्चिमी और देवरिया पूर्वी। दूसरे आमचुनाव में नए परिसीमन के बाद वर्तमान कुशीनगर लोकसभा हाटा लोकसभा क्षेत्र के रूप में जाना गया। 1957 में हाटा लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की टिकट पर काशीनाथ पांडेय सांसद चुने गए। 1962 में भी हाटा लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के काशीनाथ पांडेय चुनाव जीते। 1967 में हाटा लोकसभा क्षेत्र का नामकरण पडरौना हो चुका था। पडरौना लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर काशीनाथ पांडेय ने जीत की हैट्रिक लगाई। लेकिन 1971 में कांग्रेस ने कद्दावर नेता गेंदा सिंह को चुनाव लड़ाया और गेंदा सिंह जीतकर संसद पहुंचे। 1977 में गेंदा सिंह को हराते हुए पहली बार यहां से गैर कांग्रेसी उम्मीदवार भारतीय लोकदल के रामधारी शास्त्री को जीत मिली। 1980 व 1984 में कांग्रेस प्रत्याशी सीपीएन सिंह ने जीत हासिल की। 1989 में जनता दल के बालेश्वर यादव यहां से सांसद बने। लेकिन 1991 में परिस्थितियां बदली। रामलहर में कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपाई बने रामनगीना मिश्र ने यहां पहली बार कमल खिलाया। रामनगीना मिश्र लगातार चार बार 1991, 1996, 1998, 1999 में यहां से सांसद बने। लेकिन 2004 में बालेश्वर यादव ने नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चार बार के सांसद को हराया। 2009 में यहां से आरपीएन सिंह पहली बार सांसद बने। 2014 में भाजपा के राजेश पांडेय उर्फ गुड्डू पांडेय सांसद चुने गए।
Published on:
17 May 2019 02:02 pm
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