
राममंदिर का ताला खुलवाया था इस जज ने, मुलायम सिंह ने बताया था ईमानदार व सुलझा हुआ
यह नब्बे के दशक की बात है। राम मंदिर आंदोलन (Ayodhya Ram Mandir)अपने चरम पर पहुंचने को बेताब था। उसी राममंदिर का ताला खुलवाने वाले जज के करियर का निर्णय भी इसी दशक में होने जा रहा था। यूपी सरकार से केंद्र ने हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए जजस की लिस्ट मांगी थी। तत्कालीन सरकार केंद्र को पंद्रह न्यायाधीशों के नामों की सूची भेजी लेकिन उस लिस्ट के एक नाम पर सूबे के मुखिया मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav)का कथित नोट भी लगा था। विश्व हिंदू परिषद(VHP) के अनुसार इस एक नोट की वजह से प्रोन्नति का हकदार होने के बाद भी नाम पर केंद्र सरकार ने विचार ही नहीं किया। यह नाम था जस्टिस कृष्ण मोहन पांडेय का। जज कृष्णमोहन पांडेय(Justice KrishnaMohan Pandey), जिन्होंने जिला जज रहते हुए अयोध्या राममंदिर का ताला खुलवाया था।
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मुलायम सिंह ने इनकी ईमानदारी की तारीफ की थी
तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की ओर से जो कथित नोट इनकी प्रोन्नति में बाधक बना, उसका मजमून कुछ इस तरह का था।
‘पांडेय जी सुलझे हुए ईमानदार तथा कर्मठ जज हैं। फिर भी 1986 में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने का आदेश देकर उन्होंने सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की थी, इसलिए मैं उनके नाम की सिफारिश नहीं करता।’
दरअसल, अयोध्या राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद पूर्व जिला जज कृष्णमोहन पांडेय एक बार फिर चर्चा में हैं। यह इसलिए क्योंकि अयोध्या राममंदिर प्रकरण का सबसे अहम पड़ाव राममंदिर का ताला खुलना रहा है। एक फरवरी 1986 को राममंदिर का ताला खोला गया था। फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज कृष्णमोहन पांडेय थे। गोरखपुर के मूल निवासी न्यायाधीश पांडेय ने राम जन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश जारी कर रामलला के दर्शन व पूजा आदि की राह खोली थी। लेकिन इस आदेश के बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। इस आदेश की वजह से व्यक्तिगत नुकसान भी उनको झेलना पड़ा था। काफी दिनों तक वरिष्ठता के आधार पर प्रोन्नति सूची में नाम होने के बाद भी प्रमोशन नहीं मिल सका।
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हाईकोर्ट में उनके प्रमोशन के लिए याचिका भी पड़ी
राममंदिर(Ram Mandir) का ताला खुलवाने वाले फैजाबाद के तत्काली जिला जज कृष्णमोहन पांडेय (District Judge Krishna Mohan Pandey) 1988 में वरिष्ठता क्रम में आ चुके थे। लेकिन 1991 तक उनका प्रमोशन नहीं हो सका। 13 सितंबर, 1990 को विश्व हिंदू परिषद अधिवक्ता संघ की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर तत्कालीन जिला जज पांडेय को हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए आदेश मांगा गया। याचिकाकर्ताओं में विहिप के अधिवक्ता संघ के महासचिव हरिशंकर जैन (Harishankar Jain)सहित करीब दस अधिवक्ता थे। याचिका में आरोप लगाया गया था कि यूपी सरकार ने 15 लोगों का नाम केंद्र को भेजा था जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का लिखा कथित नोट लगा हुआ था। केंद्रीय कैबिनेट ने वह सूची विचार के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को भेजी। सीजेआई (CJI)ने उसमें से 7 नामों को मंजूरी दी, जिसमें जस्टिस पांडेय का नाम भी शामिल था। लेकिन, केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने सीजेआई की ओर से सूची में मंजूर कर भेजे गए 7 नामों में से 6 को नियुक्ति की मंजूरी दी और जस्टिस पांडेय का नाम रोक लिया। बाद में उनसे कनिष्ठ जज आरके अग्रवाल को हाई कोर्ट प्रमोट किया गया।
चंद्रशेखर की सरकार ने दिया प्रमोशन
1989 में केंद्र में बनी वीपी सिंह( VP Singh) की सरकार कुछ ही महीनों में गिर गई। नए प्रधानमंत्री के रूप में चंद्रशेखर (Chandrashekhar)ने शपथ ली। सुब्रमण्यम स्वामी (Subramaniyam Swami) नए कानून मंत्री बने। याचिका पर कोई निर्णय आने के पहले ही कानून मंत्री स्वामी ने न्यायाधीश पांडेय के प्रमोशन प्रकरण को निस्तारित कर दिया। उन्होंने स्वयं मामले को संज्ञान में लेते हुए प्रमोशन की मंजूरी दिला दी। 24 जनवरी 1991 को जस्टिस पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज बने। कुछ ही दिनों बाद उनका एमपी हाईकोर्ट ट्रांसफर हो गया। 28 मार्च, 1994 को वे रिटायर हुए।
गोरखपुर के थे केएम पांडेय
गोरखपुर के रहने वाले पूर्व जज कृष्णमोहन पांडेय ने अपनी वकालत की शुरूआत 1958 में गोरखपुर की दीवानी कचहरी से ही की थी। हालांकि, प्रैक्टिस प्रारंभ करने के दो साल बाद ही चयन राज्य न्यायिक सेवा परीक्षा में हो गया।
Published on:
11 Nov 2019 07:07 am
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