
nanaji deshmukh interesting facts on his death anniversary
धीरेंद्र विक्रमादित्य गोपाल
गोरखपुर। 80 और 90 साल की उम्र में भी राजनीतिक पद की लालसा वाले लोगों के लिए नानाजी देखमुख एक नजीर हैं। भले उनकी ही पार्टी नानाजी के दिखाए रास्ते पर नहीं चल सकी लेकिन सेवा को राजनीति का हिस्सा बनाने वाले इस संत को हर कोई आज भी आदर से याद करता है।
भारत रत्न के ऐलान के बाद गोरखपुर और आसपास का क्षेत्र खुद को बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहा है। यह इसलिए क्योंकि इस क्षेत्र ने नानाजी के हाथों को खुद को संवरते-निखरते देखा है। यह नानाजी ही थे जिन्होंने देश का पहला सरस्वती विद्यालय गोरखपुर में खोलकर अंग्रेजी शिक्षा की लार्ड मैकाले प्रणाली को चुनौती दी थी।
गोरखपुर में आरएसएस के प्रचारक रह चुके नानाजी देखमुख की यादें यहां के जनमानस में रची बसी है। पुराने लोग उनको यादकर आज भी भावुक हो जाते हैं।
जब संघ को खड़ा करने के लिए नानाजी ने बावर्ची बनना स्वीकारा
नानाजी देखमुख गोरखपुर क्षेत्र में प्रचारक के तौर पर आए थे। यह वह दौर था जब संघ अपनी जड़ें जमा रहा था। जनसंघ शैशवाकाल में था। लोग बताते हैं कि नानाजी को यहां रहकर अपना काम करते हुए खर्च चलाना मुश्किल हुआ तो वह बाबा राघवदास के संपर्क में आए। बाबा ने नानाजी को अपने यहां रहने का प्रस्ताव रखा लेकिन शर्त यह थी कि वह बाबा के लिए खाना बनाएंगे। नानाजी ने बिना देर किए बाबा राघवदास के लिए बावर्ची बनना स्वीकार किया।
नानाजी ने बुला लिया डाॅ. लोहिया को जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन में
आरएसएस के नागपुर मुख्यालय में कांग्रेसी नेता व देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को बुलाने पर पूरे देश में राजनैतिक हंगामा बरपा लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि राजनैतिक अछूतवाद को तोड़ने का काम सबसे पहले नानाजी ने ही की थी। नानाजी ने साठ के दशक में जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन में उस समय के बड़े समाजवादी नेता डाॅ.राममनोहर लोहिया को आमंत्रित किया था। डाॅ.लोहिया ने जनसंघ कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। माना जाता है कि नानाजी के इस कदम से पहली बार देश में गैर कांग्रेसी सरकार बनाने की कवायद भी शुरू हुई थी। 1967 में यूपी में चैधरी चरण सिंह की अगुवाई में पहली बार सोशलिस्ट सरकार बनी थी।
राजनीति के संत जिन्होंने मंत्रीपद ठुकराया
नानाजी देशमुख 1977 में बलरामपुर से चुनाव जीतकर संसद पहंुचे थे। मुरारजी के मंत्रीमंडल में नानाजी देशमुख का नाम भी प्रमुख था। लेकिन नानाजी ने ऐन वक्त पर सबको चैका दिया। उन्होंने कहा कि वह सरकार में मंत्री पद स्वीकारने की बजाय संगठन के लिए काम करेंगे।
वनवासी राम के लिए ले लिया सन्यास
देश की राजनीति का पहला और इकलौता मामला होगा जो आज के राजनीतिज्ञों के लिए एक सबक भी है। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी में बिघटन शुरू हो चुका था। जनसंघ के नेताओं ने जनता पार्टी से अलग होकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी। पार्टी को नए सिरे से संगठित करना था इसके लिए यूपी में नानाजी का साथ जरूरी था। लेकिन नानाजी के एक फैसले ने तो भूचाल ला दिया। वह निर्णय था राजनीति से उनके सन्यास लेने का था। नानाजी ने राजनीति से सन्यास लेने का ऐलान कर दिया। और इसी के साथ उन्होंने चित्रकूट जाने का निर्णय ले लिया। यह उन राजनीतिज्ञों के लिए भी एक सबक थी जो राम के नाम पर राजनीति चमकाना चाहते हैं। राजनीति से सन्यास के बाद नानाजी ने कहा कि मैं तो वनवासी राम की शरण में जा रहा।
बता दें कि चित्रकूट में नानाजी ने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की थी। फिर वहीं चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय बनाया।
जेपी आंदोलन में बढ़चढ़कर लिया था हिस्सा
जेपी के साथ नानाजी देशमुख ने बढ़चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लिया था। पटना में जनता सड़कों पर थी। अपने बुजुर्ग नेता जेपी के साथ नानाजी देशमुख भी थे। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। जेपी पुलिस से घिर गए। नानाजी ने जब जेपी को पुलिस से घिरता देखा तो दौड़े हुए पहुंचे और जेपी के उपर लेट गए। जितनी लाठियां पड़ी उसे नानाजी ने झेली। पुलिस की लाठी से नानाजी का हाथ टूट गया लेकिन उन्होंने अपने बुजुर्ग नेता पर आंच नहीं आने दी।
Published on:
26 Jan 2019 01:48 pm
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