
फिराक गोरखपुरीः ज्ञानपीठ की मिली एक लाख धनराशि पर बोले, यह धनराशि कहां संभाल पाउंगा
वाकया 1971-72 का है। सबके चहेते फिराक को ‘गुल-ए-नगमा’ को ज्ञानपीठ से नवाजा गया था। फिराक साहब मंच पर ज्ञानपीठ लेने पहुंचे। सम्मान के साथ सम्मान राशि करीब एक लाख रुपये उनको दिया गया। सम्मान राशि को लेने के साथ उसे पुनः आयोजकों को देते हुए कहा कि यह राशि मैं कहां संभालूं। इसे आप रखें और रकम का उपयोग उन जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए करें जिनकी पढ़ाई या तैयारी में पैसा आड़े आ रहा हो।
इस नेकदिली के किस्से को 48 साल हो चुके हैं पर फिराक गोरखपुरी जेहन में आते ही यह किस्सा भी बरबस आ ही जाता है। लेकिन अफसोस कि फिराक गोरखपुरी को वह शहर भुलाते जा रहा है जहां उन्होंने जन्म लिया, वह शहर जिसे लोग फिराक(Firaq Gorakhpuri) के शहर के नाम से जानते हैं। अगर किसी स्मृति की बात करें तो फिराक के नाम पर शहर में एकमात्र एक चौराहा मौजूद है जहां उनकी प्रतिमा लगी हुई है। शहर का वह मकान, गांव की उनकी यादें, सबकुछ समय के साथ धुंधली हो चुकी हैं। किसी ने उसे सहेजने की कोशिश भी नहीं की। शायद वह भी नहीं जो फिराक को मिली सम्मान राशि से जीवन में कुछ अच्छा मुकाम पाए हों। शहर और शहरवासियों की बेवफाई पर शायद फिराक यही सोच रहे होंगे, ‘कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैैठे थे हम, उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम। रफ्ता-रफ्ता गैर अपनी ही नजर में हो गए, वाह री गफलत तुझे अपना समझ बैठे थे हम।’
बहनों की शादी व कर्ज चुकता करने के लिए बेच दिया था घर
गोरखपुर शहर के तुर्कमानपुर में एक टूटा फूटा खंडहर सा दिखने वाला मकान है। लक्ष्मी निवास (Firaq home Lakshmi niwas) के नाम से जाना जाने वाला यह मकान कभी फिराक गोरखपुरी का पता हुआ करता था। यहां देशभर के साहित्यकार, लेखक और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हस्तियों का जमावड़ा हुआ करता था। लेकिन अपने जीवनकाल में ही महान शायर फिराक गोरखपुरी ने इस मकान को बेच दिया था। बताया जाता है कि बहनों की शादी व कर्ज का बोझ उतारने के लिए उनको यह निर्णय लेना पड़ा। आज लक्ष्मी निवास जर्जर हो चला है। एक हिस्से में विद्यालय संचालित है तो दूसरे हिस्से में इस मकान को खरीदने वाला परिवार रह रहा है। अफसोस कि इस घर में कहीं भी फिराक से जुड़ी कोई याद अब संरक्षित नहीं। फिराक ने अपनी शायरी में जिस गर्व से यह शेर कही थी उसका भी मान यह शहर शायद नहीं रख सका। बकौल फिराक, ‘आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों, जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फिराक को देखा था।’
बरवापार से निकलकर दुनिया के माथे पर चमकने वाला कोहिनूर थे फिराक
गोरखपुर में गोला तहसील है। यह तहसील एक गांव है बरवापार(Firaq Gorakhpuri village barwapar)। 28 अगस्त 1896 को इसी गांव में एक बालक का जन्म हुआ जिसे उनके माता-पिता ने नाम दिया रघुपति सहाय। बाद में दुनिया जिसे फिराक गोरखपुरी के नाम से जानती और प्यार करती। फिराक गोरखपुरी यहां के प्रसिद्ध अधिवक्ता गोरख प्रसाद इबरत के पुत्र थे। इबरत पंडित मोतीलाल नेहरू के मित्र हुआ करते थे। फिराक पिता के साथ आनंद भवन आते जाते रहे और धीरे धीरे पंडित जवाहर लाल नेहरू से मित्रता हो गई। नेहरू के करीबियों में शुमार फिराक स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहे। पिता की मृत्यु के बाद घर की जिम्मेदारी सिर पर आ गई। बहनों की शादी भी करनी थी। नेहरू ने फिराक की परेशानी को भांपते हुए कांग्रेस कार्यालय में नौकरी दे दी लेकिन फिराक कहां इसमें रमते। कुछ ही दिन में उनका मन भर गया और नौकरी छोड़ दी। खुद्दार फिराक ने किसी से मदद मांगने की बजाय अपना गोरखपुर वाला घर बेचने का निर्णय लिया। लक्ष्मी निवास बेचकर बहनों की शादी की, कर्ज चुकाया और आगरा चले गए।
आगरा से इलाहाबाद लौटे और विवि में अंग्रेजी के प्रवक्ता बने
लक्ष्मी निवास बेचने के बाद फिराक गोरखपुरी आगरा चले गए। वहां सेंट स्टीफंस काॅलेज में पढ़ाने लगे। वहां ज्यादा दिन मन नहीं रमा। फिर इलाहाबाद लौटने का निर्णय लिया। इलाहाबाद आए। यहां इलाहाबाद विवि में अंग्रेजी विभाग में प्रवक्ता हो गए। इलाहाबाद में रहकर खूब साहित्यिक सेवा की। 3 मार्च 1982 को दुनिया का यह महान शायर दुनिया को अलविहा कर गया।
जिस गांधी से प्रभावित होकर नौकरी छोड़ी आलोचना से भी नहीं चूके
फिराक गोरखपुरी स्नातक करने के बाद पीसीएस हो गए थ। स्वतंत्रता संग्राम का दौर था। गांधीजी देशभर में घूम घूमकर स्वाधीनता की अलख जगा रहे थे। अफसरी के दौरान फिराक साहब को कई बार गांधी जी को सुनने का मौका मिला। 1921 की बात है बापू गोरखपुर आए थे। गांधी से फिराक इतना प्रभावित हुए कि अफसरी छोड़ स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में कूद पड़े। असहयोग आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी निभाई। अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार किया तो फिराक साहब को डेढ़ साल तक जेल में भी काटनी पड़ी। हालांकि, फिराक गोरखपुरी महात्मा गांधी की आलोचना से भी कभी नहीं चूके। चैरीचैरा कांड के बाद विचलित महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया। यह फिराक को नहीं जमी। उन्होंने खुलकर अपना विरोध दर्ज कराया।
न पुरस्कार की चाहत न पद की लालसा
ज्ञानपीठ पुरस्कार राशि को जरूरतमंद विद्यार्थियों को मदद के लिए इस्तेमाल किए जाने के लिए देने वाले फिराक गोरखपुरी सदी में विरले ही पैदा होते हैं। जिस पद और पुरस्कार के लिए कथित साहित्यक जगत के लोग सत्ता और आयोजकों के इर्दगिर्द ही जमे रहते हैं उस पद और पुरस्कार को न जाने कितनी बार फिराक गोरखपुरी ने ठुकराया हो। यह उस समय की बात है, प्रधानमंत्री पद पर इंदिरा गांधी विराजमान थी। नेहरू के दोस्त फिराक गोरखपुरी को वह राज्यसभा भेजना चाहती थी। इसका प्रस्ताव उन्होंने खुद फिराक साहब को दिया। लेकिन बड़ी शालीनता से फिराक गोरखपुरी ने ठुकरा दिया। उन्होंने उनके प्रस्ताव पर शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि मेरे लिए यही सबसे बड़ी सौगात है जो आपने मेरे बारे में सोचा। आप इसी तरह ख्याल रखती रहें।
बहरहाल, फिराक अब इस दुनिया में नहीं है। हर 28 अगस्त को बरबस ही वह याद आ जाते हैं। लेकिन उनकी यादों व स्मृतियों को भूलाते शहर को एक बार फिर से उसे संजोने के लिए खड़ा होने की जरूरत है ताकि हम सब फक्र से इस महान शायर से कह सकें, 'एक मुद्दत से तेरी याद भी आयी न हमें और हम भूल गयें हो तुझे, ऐसा भी नहीं।’
हालांकि, फिराक ने ही कहा था, ‘किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर...फिर भी, ये हुस्नों-इश्क तो धोखा है सब... मगर फिर भी।’
Published on:
28 Aug 2019 03:58 pm
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