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गुना में पशु अस्पतालों के भवन और स्टाफ पर हर माह खर्च हो रहा लाखों रुपए का बजट

- कागजों में ही संचालित हो रहीं सरकार की योजनाएं, धरातल पर पशुओं को प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं- पशु मालिक बोले, न अस्पताल में डॉक्टर मिलते हैं और न फोन करने पर आते हैं- समय पर पशुओं का नहीं हो रहा टीकाकरण, इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे जानवर

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गुना में पशु अस्पतालों के भवन और स्टाफ पर हर माह खर्च हो रहा लाखों रुपए का बजट

गुना में पशु अस्पतालों के भवन और स्टाफ पर हर माह खर्च हो रहा लाखों रुपए का बजट

गुना. सरकार इंसानों के साथ-साथ जानवरों को भी हर जरूरी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अस्पतालों के भवन निर्माण से लेकर डॉक्टर्स व अन्य सहयोगी स्टाफ के वेतन पर हर माह करोड़ों रुपए का बजट खर्च किया जा रहा है। इसके बावजूद पशुओं को इलाज नहीं मिल पा रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि यह स्थिति जिला मुख्यालय पर बने पशु अस्पताल की है। ऐसे में तहसील व ग्रामीण स्तर पर पशु चिकित्सा के क्या हाल होंगे इसे आसानी से समझा जा सकता है। चिंता की बात यह है कि शहर के हाट रोड स्थित पशु अस्पताल पर तीन डॉक्टर्स सहित कुल 8 लोगों का स्टाफ है। इसके बावजूद पशु मालिकों को यहां डॉक्टर नहीं मिलते। ऐसे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो इलाज कर दे उसे ही पशु मालिक ठीक मानकर चले जाते हंै।
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वेतन ले रहे लाखों रुपए, सुविधाएं जीरो
पशु चिकित्सा विभाग ऐसा क्षेत्र है जिसकी ओर प्रशासन का कतई ध्यान नहीं है। यही वजह है विभाग में पदस्थ डॉक्टर्स
अपने सेवाएं नियमित रूप से अस्पतालों में नहीं दे रहे है। यही नहीं पशु मालिक जब इन अस्पतालों में पशुओं को लेकर पहुंचते हैं तो वे अधिकांश समय मिलते ही नहीं है। जो चतुर्थ श्रेणी स्टाफ मिलता है वह बाद में आने की बात कह देता है। लेकिन इसके बाद भी यदि डॉक्टर नहीं मिलते तो उन्हें फोन लगाया जाता है लेकिन वह रिसीव नहीं करते। इसी तरह के हालात जिला मुख्यालय के अलावा तहसील क्षेत्र में है। आला अधिकारियों के इस तरह के रवैए से प्रेरित होकर अधीनस्थ स्टाफ भी अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ रहा है। नतीजतन न तो पशुओं का नियमित रूप से टीकाकरण हो पा रहा है और न ही प्राथमिक उपचार मिल पा रहा है।
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एक्सरे से लेकर सोनोग्राफी की है सुविधा
पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि जिला मुख्यालय के पशु अस्पताल में हर वह सुविधा उपलब्ध है, जो इंसानों के अस्पताल में है। सबसे पहले तो अस्पताल के भवन बिल्डिंग नई है। जिसमें बकायदा ओपीडी सहित डॉक्टर्स के बैठने के लिए अलग से कक्ष हैं। यही नहीं वेटिंग रूम से लेकर अलग से एक्सरे रूम तथा सोनोग्राफी की भी सुविधा उपलब्ध है। लेकिन जरुरत के समय डॉक्टर्स न मिलने इन सुविधाओं का लाभ पशुओं को नहीं मिल पा रहा है।
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इस उदाहरण से समझें पशु अस्पताल की हकीकत
तारीख : 22 फरवरी
समय : रात 11.45 बजे
क्या हुआ : एक निराश्रित गाय डिलेवरी के समय परेशान हो रही थी। उसके बछड़े को जैसे-तैसे बाहर निकाला गया । लेकिन गाय के योनी मार्ग की पोटली पूरी बाहर आ गयी थी। आवारा कुत्तों का शिकार होने से पहले ही जन सेवक अकरम भाई वहां थे। अब इस अवस्था में पशु चिकित्सक आवश्यकता पड़ी। उपसंचालक भदौरिया को दो बार फोन लगाया गया। लेकिन फोन रिसीव नहीं किया। फिर मजबूर होकर गुना एसडीएम वीरेंद्र सिंह बघेल को फोन लगाया गया। उन्होंने तुरन्त फोन उठाया। उन्हें गाय की हालात से अवगत कराया गया। फिर उन्होंने पशु चिकित्सा के उपसंचालक भदौरिया को फोन लगाया तब कहीं जाकर दो कर्मचारी मौके पर आए । लेकिन उनके पास भी कोई भी दवा, टांकें लगाने की सुई, उपकरण नहीं थे। रात्रि में इधर-उधर घरों से बड़ी सुई ली गई तब जाकर गाय का इलाज किया गया।
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पशु अस्पताल में यह स्टाफ है तैनात
डॉ अभिषेक राजपूत, डॉ स्मृति पाण्डेय प्रभारी, परमाल सिंह यादव, मानसिंह लोधा, महेश कुमार लाहौट, उमा शर्मा, ऊधम सिंह प्रजापति, केशलाल।
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चिकित्सालय का समय
सुबह 9 से 1.30 बजे, 2 से 4 बजे तक, रविवार एवं अन्य शासकीय अवकाश के दिन सुबह 9 से 11 बजे तक।
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पशु मालिकों की जुबानी पशु अस्पताल की कहानी
मैं अपने पशु को लेकर अस्पताल पहुंचा था। लेकिन डॉक्टर नहीं मिले। भृत्य ने बताया कि अभी डॉक्टर नहीं हैं दो बजे के बाद आ जाना। इस समय पर पहुंचे तब भी डॉक्टर नहीं मिले।
राजेंद्र, पशु मालिक
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मैं अपने पालतु डॉग को लेकर पशु अस्पताल पहुंचा था। डॉक्टर तो मिल गए लेकिन सभी दवाएं बाहर से मंगवाई। जो काफी महंगी थी। डॉग के इलाज के नाम पर यहां केवल एंटी-रेबिज इंजेक्शन ही उपलब्ध था। कुत्ते को लगने वाली अन्य वैक्सीन मौजूद नहीं थी।
राजाराम, पशु मालिक