
'मुझे वजह ना दो हिन्दू या मुसलमान होने की, मुझे तो सिर्फ तालीम चाहिए एक
गुवाहाटी(असम)राजीव कुमार:
'मुझे वजह ना दो हिन्दू या मुसलमान होने की,
मुझे तो सिर्फ तालीम चाहिए एक "इंसान" होने की..'
शायद यही इंसानियत की तालीम पाई है शिल्पकार कुमार ने। कुमार ने अपने हालात को भूल कर लॉक डाउन के संकट में फंसे मुस्लिम फेरेवालों को न सिर्फ घर में रखा बल्कि रमजान में उनके खाने-पीने का इंतजाम करके सही मायने में गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण पेश किया। इंसानियत का ऐसा उदाहरण जो इस दौर में मुश्किल से ही मयस्सर होता है।
13 खिलौने वालों को शरण
कोरोना महामारी के बीच सभी संकट से गुजर रहे हैं। ( Assam News ) लेकिन संकट के बीच भी लोग हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश कर रहे हैं। यही मानवता है। असम के धुबड़ी के देव कुमार (55) ने बिहार के खगडय़िा और सहरसा के लॉक डाउन में फंसे 13 खिलौना बनाने वालों को अपने घर में ठहराने में एक मिनट के लिए नहीं सोचा और हामी भर दी है। कुमार के घर में वे मार्च के पहले हफ्ते से रह रहे थे।
लॉकडाउन में फंस गए थे
बिहार ( Bihar ) के शिल्पकार कुमार के घर हर साल आते हैं। यहां होने वाले मेलों में खिलौने बेचने के लिए वे आते हैं। कुमार कुम्हार हैं। बिहार से आए मुस्लिम संप्रदाय के लोग यहां आकर कुमार (Sheltered 13 Muslims ) के घर दो-तीन महीने रहकर फिर चले जाते हैं। कुमार कहते हैं कि वे (Hindu-Muslim unity ) सभी को हर साल आश्रय देते हैं। ये लोग बांस, प्लास्टिक और मिट्टी से खिलौने तैयार करते हैं। मैं अपने मिट्टी के कारखाने में मिट्टी के सामान तैयार करता हूं और उन्हें बेचता हूं। फिर ये लोग इनसे खिलौने बनाकर धुबड़ी जिले के विभिन्न स्थानों और होने वाले मेलों में बेचते हैं। लेकिन लॉकडाउन के चलते ये सभी इस बार बिना काम के फंस गए।
हिंदू घर में पूजा भी नमाज भी
अपने पास पैसे रहने तक इन्होंने खुद खाने की सामग्री खरीदी। लेकिन जब पैसा खत्म हो गया तो कुमार और उनके पड़ोसी हिंदू परिवार ने इन्हें खाना मुहैया कराना शुरु किया। कुमार ने कहा कि मेरे पास दो अतिरिक्त कमरे थे, जहां ये रह रहे थे। यह रमजान का महीना है। कुछ लोग फल लाए तो कुछ लोग अन्य सामान। हर दिन शाम को मेरे परिवार में पूजा होती है तो ये नमाज अता करते। कुमार भी बिहार से हैं लेकिन दशकों से उनका परिवार धुबड़ी आ बसा था।
हम जिंदगी भर याद रखेंगे
प्रवासी शिल्पकार कुमार को रक्षक मानते हैं। खगडिय़ा के सजीद कहते हैं कि वे हमारे रक्षक हैं। उनके और पड़ोसियों से आई मदद के चलते हम जिंदा रह सके। हम उन्हें कभी भूल नहीं सकते। सहरसा के मोहम्मद हीरा का कहना था कि मैं अपने जीवन में सदा कुमार का ऋणी रहूंगा। मैं अपने पांच सदस्य वाले परिवार का एकमात्र कमाई करने वाला व्यक्ति हूं। मैं ही यहां लॉकडाउन में फंस गया। अब इनके लिए प्रशासन ने बस का इंतजाम कर दिया तो ये सभी बिहार के लिए चले गए हैं। पर विदाई की बेला में सभी भाव विभोर हो गए। कुछ दिनों पहले शिवसागर में एक हिंदू वृद्धा के मरने पर मुस्लिम परिवारों ने हिंदू रीति के अनुसार वृद्धा का दाह संस्कार किया था।
Published on:
16 May 2020 05:57 pm
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