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इस वजह से लुप्त होता जा रहा हैं पर्यावरण मित्र ‘गिद्ध’, त्रिपुरा में संरक्षण के लिए बनेगी आवासीय कॉलोनी

वन विभाग उपयुक्त आवास के साथ पर्याप्त मात्रा में उनके लिए भोजन सामग्री भी उपलब्ध कराएगा...

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Vultures

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(अगरतला,सुवालाल जांगु): त्रिपुरा वन विभाग राज्य के खोवाई जिले में प्राकृतिक सफाई कर्मी और पर्यावरण मित्र– गिद्दों के लिए एक आवास कॉलोनी बनाने की योजना तैयार कर रहा हैं। कई रिपोर्टों के मुताबिक हाल के वर्षों में खोवाई जिले की अलग-अलग जगहों पर गिद्धों के कई झुंड देखे गए हैं। कलयनपुर क्षेत्र में 26 गिद्धों को देखा गया और चेबरी क्षेत्र में 10 गिद्दों को देखा गया था। खोवाई में अच्छी संख्या में गिद्धों का पाया जाने से राज्य का वन विभाग काफी उत्साहित हैं और अब वन विभाग कलयनपुर और चेबरी में गिद्धों के लिए माकूल आवास स्थलों का निर्माण करने पर विचार कर रही हैं।

वन विभाग उपयुक्त आवास के साथ पर्याप्त मात्रा में उनके लिए भोजन सामग्री भी उपलब्ध कराएगा। इसके अलावा वन विभाग शिमुल के पेड़ भी लगायेगा जो गिद्धों के लिए घोसला बनाने के लिए अनुकूल होते हैं। खोवाई जिले के अलावा राज्य के दक्षिण त्रिपुरा और सिफाजिला जिलों में भी गिद्द पाए गए हैं। जैसा की हम जानते हैं कि गिद्ध प्राकृतिक कचरा निस्तारण करने वाले जन्तु के तौर पर जाता हैं। वातावरण को साफ-सुथरा और बीमारियों से मुक्त रखने में गिद्ध की महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं।


डाइक्लोफिनाक दवाई का दुधारों जानवरों को खिलाने से और इनके प्राकृतिक आवास स्थलों का कम हो जाने से गिद्धों की आबादी में काफी कमी आयी हैं। यह दवाई पालतु जानवरों को दर्द निवारक के तौर पर दी जाती हैं जो उनमें में तो कोई नुकसान नहीं करती हैं लेकिन उनके मर जाने के बाद गिद्धों के द्वारा खाने पर यह दवाई उनमें धीमे जहर की तरह असर करती हैं। पालतू जानवरों के मरे जाने के बाद गिद्द उनको खा जाते है जिससे यह दवा गिद्दों की किडनी की संक्रमित कर देती हैं और ऐसे में कुछ दिनों में गिद्द की मौत हो जाती हैं।

पशुपालक इस दवा का इस्तेमाल गैर-कानूनी तौर पर करते हैं। हालांकि सरकार ने इस दवा के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया हैं फिर भी बाजार में यह दवा चोरी-छुपे उपलब्ध हो रही हैं हालांकि यह दवा महंगी होने की वजह से त्रिपुरा में इसको कोई आसानी से खरीद नही पाता हैं। त्रिपुरा में जिप्स बेंगालेन्सिस नाम की गिद्ध-प्रजाति पायी जाती, इनके शरीर का अगला हिस्सा सफेद होता है। यह प्रजाति शेष भारत में लगभग विलुप्त होने के कगार पर हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल, असम और त्रिपुरा में अभी इस प्रजाति के गिद्दों की मौजूदगी हैं लेकिन इनको पर्याप्त संरक्षण की जरूरत हैं। अरुणाचल में गिद्दों के संरक्षण के लिए डाईङ्ग एरिंग मेमोरियल वाइल्ड्लाइफ अभयारण्य हैं।