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इस 1100 साल पुराने मंदिर से जुड़े हैं कई राज, तो इस वजह से लोग मानते हैं इसे चमत्कारी

1100 वर्ष पुराना बौरेश्वर शिवमंदिर अपनी अनूठी निर्माण शैली तथा चमत्कारिक विशालकाय शिवलिंग के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है।

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shyamendra parihar

Aug 05, 2017

shivling, mahadev

shivling of boreshwar mahadev

ग्वालियर/भिंड। अटेर विकासखण्ड की ग्राम पंचायत दुल्हागन में 1100 वर्ष पुराना बौरेश्वर शिवमंदिर अपनी अनूठी निर्माण शैली तथा चमत्कारिक विशालकाय शिवलिंग के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। मंदिर पुरातत्व विभाग का संरक्षित स्मारक है। पुरातत्व विभाग इसे धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रहा है।

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10वीं शताब्दी में हुआ है मंदिर का निर्माण
मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी का है। गुर्जर प्रतिहार तथा गुप्तवंश के राजाओं के द्वारा इसका निर्माण कराया गया। मंदिर चार फीट ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है। मंदिर के गुम्बद की ऊंचाई लगभग 125 फीट है, जो 10 कोणीय स्वरूप में है। मंदिर के मुख्य द्वार के सम्मुख चबूतरे की ऊंचाई 2 फीट है, गर्भगृह में अंदर लगभग 2.50 मीटर व्यास का तथा तकरीबन 3 फीट ऊंचा शिवलिंग स्थापित है। प्रवेश द्वार के बाहर सफेद सामान्य पत्थर के एक भीमकाय नंदी की भी प्रतिमा स्थापित है।


अपने आप में खास हैं बौरेश्वर महादेव का मंदिर
जिला पुरातत्व अधिकारी वीरेन्द्र पाण्डेय के अनुसार, मंदिर नागर शैली में बना है। इसकी दीवारों पर किसी प्रकार का कलात्मक प्रोजेक्शन नहीं है पर इसकी बनावट अपने आप में एक विशिष्टता लिए हुए है। पंचरथी आधार पर बने इस मंदिर की दीवारें शिखर तक शनै: शनै: झुकती चली गई हैं। रथ के कोणों में शिखर तक किसी प्रकार का अवरोध नहीं है पर मंदिर के मुख्य द्वार के ऊपर शिखर के प्रोजेक्शन दिए गए हैं।

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शिखर के ऊपर कलश स्थापित है। दरवाजे पर परिचारकों **** गंगा-यमुना की सुंदर नारी सुलभगुणों से युक्त यवनमयी प्रस्तर प्रतिमाओं का अंकन है। इसके बाद दोनों ओर दण्डधारी द्वारपालों की प्रतिमाओं का उत्कीर्णन है। मंदिर के प्रवेश द्वार के संदल के बीच में गरुड़ पर आसीन भगवान विष्णु की आकृति तथा आसपास गंधर्वों का अंकन है।

मंदिर के उत्तर में एक पुराना तालाब भी है, जहांं प्रतिवर्ष भादों कृष्णपक्ष छठ (षष्ठी) तिथि के दिन नवविवाहित युगलों के मौर विसर्जन मेले का आयोजन होता है। शिवरात्रि पर भी यहां हजारों की संख्या में कांवडि़ए और आमजन शिवलिंग के अभिषेक तथा पूजार्चना के लिए आते हैं। अंचल में मान्यता है कि शिवलिंग पर चावल चढ़ाने से मनुष्य के शरीर के मस्से बिना किसी दवा व उपचार के स्वत: ठीक हो जाते हैं। मंदिर के संरक्षण का कार्य कर रहे स्थानीय नागरिक नमोनारायण दीक्षित कहते हैं, मंदिर अपने अनूठे निर्माण शिल्प के कारण इतिहास व पुरातत्व के शोधार्थियों, पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है।

ऐसे पहुंचा जा सकता है बौरेश्वर गांव तक
जिले के फूप-सुरपुरा स्टेट हाईवे से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है दुल्हागन पंचायत का बौरेश्वर गांव, जहां यह प्राचीन शिवमंदिर स्थापित है। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी लगभग 21 किलोमीटर है तथा यहां, फूप तक भिण्ड-इटावा नेशनल हाईवे से एवं उसके बाद फूप-प्रतापपुरा स्टेट हाईवे से यात्रा करके पहुंचा जा सकता है। बौरेश्वर गांव की अटेर की चंबल नेशनल घडिय़ाल सेंचुरी और अटेर दुर्ग से दूरी लगभग 18 किमी है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पक्का डामरीकृत सड़क मार्ग है। मप्र के पुरातत्व विभाग ने इसे सी श्रेणी के संरक्षित स्मारक के रूप में सूचीबद्ध किया हुआ है। मंदिर की सुरक्षा के लिए एक चौकीदार तैनात है। स्थानीय जोगी समुदाय का एक व्यक्ति मंदिर का पुजारी है।

"मंदिर पुरातत्व विभाग का संरक्षित स्मारक है। जिला प्रशासन की पहल पर इसे धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है।"
-वीरेन्द्र पाण्डेय, जिला पुरातत्व अधिकारी भिण्ड