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ग्वालियर. पॉलिसी संकट के वक्त सहारा बननी चाहिए ऐसी धारणा पर पानी फिरता नजर आ रहा है। उपभोक्ता फोरम के ताजा आंकड़े बतलाते हैं कि ग्वालियर व आसपास के उपभोक्ताओं ने सबसे ज्यादा निराशा बीमा कंपनियों से पाई है, कुल मामलों में अकेले 32% शिकायतें बीमा से जुड़ी हैं। इसके बाद बिजली विभाग (12%) और फाइनेंस सेक्टर के मामले आते हैं, जिनमें विशेष तौर पर सहारा से जुड़े निवेश विवाद प्रमुख हैं।
फोरम के जानकारों के मुताबिक बीमा मामले अक्सर इसलिए लंबित रहते हैं क्योंकि कंपनियां छोटे-बड़े क्लेमों में नियम-कायदे बदल देती हैं। छोटी क्लेम राशि पर तो कंपनियां आसानी से दावा मान लेती हैं, पर जब इलाज का बिल बड़ा होता है तो पुरानी बीमारी या दस्तावेजी कमी जैसे बहानों पर 38त्न के करीब मामलों में क्लेम रिजेक्ट या बेहद कम भुगतान कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि छोटे-मोटे निवेशकों व बीमाधारकों को अदालतों व फोरम के चक्कर काटने पड़ रहे हैं और कई बार राहत मिलती भी है।
फायनेंस से जुड़ी शिकायतों में सहारा इंडिया प्रमुख है — मैच्योरिटी के बाद भी निवेशकों की पूंजी न लौटने पर फोरम में मामले बढ़े हैं। कई मामलों में न्यायालय ने निवेशकों को राशि लौटाने का आदेश दिया है, लेकिन वसूली की प्रक्रिया जटिल है। बिजली बिल की मनमानी भी बड़ी समस्या है, मीटर रीडर की त्रुटि, औसत बिङ्क्षलग और सिस्टम की खामियों के कारण उपभोक्ता बार-बार फोरम का रुख कर रहे हैं।
कंपनियां अक्सर छोटी कमियों को बहाने बनाकर बड़े क्लेम ऑफ- लोड करती हैं। कैशलेस इलाज का सिस्टम सु²ढ़ किया जाना चाहिए और फोरम की कार्यवाही शीघ्र होनी चाहिए।
सत्य शर्मा, अधिवक्ता, उपभोक्ता फोरम
Updated on:
30 Jun 2026 06:01 pm
Published on:
30 Jun 2026 06:01 pm
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