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मोबाइल नंबर बदला, नेट बैंकिंग से निकाले 2 लाख, 6 माह बाद जागी पुलिस

शहर में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें भाजपा नेता के बैंक खाते से दो लाख रुपये उड़ा लिए गए। हैरानी की बात यह रही कि पीड़ित को एफआईआर दर्ज कराने के लिए पूरे छह महीने तक थानों और अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। आखिरकार 1930 हेल्पलाइन पर ई-एफआईआर की शिकायत […]

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शहर में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें भाजपा नेता के बैंक खाते से दो लाख रुपये उड़ा लिए गए। हैरानी की बात यह रही कि पीड़ित को एफआईआर दर्ज कराने के लिए पूरे छह महीने तक थानों और अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। आखिरकार 1930 हेल्पलाइन पर ई-एफआईआर की शिकायत के बाद मामला दर्ज हो सका। पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिन खातों में रुपये ट्रांसफर हुए हैं, वे झारखंड राज्य के हैं। फिलहाल बैंक रिकॉर्ड और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।हजीरा रामनगर लूटपुरा निवासी भाजपा नेता राजेश सिंह तोमर के साथ 17 अगस्त 2025 को ठगी हुई थी। राजेश तोमर के मोबाइल पर बैंक से ट्रांजेक्शन का मैसेज आया। मैसेज पढ़ते ही उनके होश उड़ गए, क्योंकि उनके तानसेन नगर स्थित एचडीएफसी बैंक खाते से दो लाख रुपये निकल चुके थे, जबकि उन्होंने किसी को भी भुगतान नहीं किया था। अगले दिन 18 अगस्त को वे बैंक पहुंचे और खाते से रुपये निकलने की शिकायत की। बैंक की प्रारंभिक जांच में पता चला कि उनके खाते को नेट बैंकिंग के जरिए ऑपरेट किया गया और आरटीजीएस के माध्यम से रकम कई खातों में ट्रांसफर की गई। पीड़ित का कहना था कि उन्होंने न तो नेट बैंकिंग का उपयोग किया और न ही कोई ट्रांजेक्शन किया है।

खाते में बदला गया था नंबर

बैंक की जांच में यह भी सामने आया कि अगस्त 2025 में राजेश तोमर के खाते में उनके अलावा एक नया मोबाइल नंबर लिंक किया गया था। इसी नंबर के जरिए नेट बैंकिंग एक्टिव कर दो लाख रुपये ट्रांसफर किए गए। जैसे ही खाते का बैलेंस लगभग खत्म हुआ, ठगों ने वह नंबर खाते से हटा भी दिया। बैंक अधिकारियों ने बताया कि मोबाइल नंबर जोड़ने की प्रक्रिया में ओटीपी की जरूरत होती है, जो खाताधारक के मोबाइल पर आता है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि पीड़ित का मोबाइल हैक कर ठगी को अंजाम दिया गया।

-बैंक से जानकारी मिलने के बाद राजेश तोमर ने हजीरा थाने, साइबर थाने और एसपी कार्यालय में शिकायतें कीं, लेकिन जांच के नाम पर मामला लंबित रखा गया। लगातार शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। आखिरकार करीब दस दिन पहले उन्होंने साइबर हेल्पलाइन 1930 पर ई-एफआईआर दर्ज कराई, तब जाकर पुलिस ने प्रकरण पंजीबद्ध किया।