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देसी अड्डो पर बने पिस्टल, तमंचों की दम पर शहर, देहात में खून का खेल

हथियारों की खेप तो पकड़ी, बनाने वाले और कारतूस कहां से आए पता नहीं लगा पाती पुलिस

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ग्वालियर। देसी पिस्टल, तमंचों की दम पर सिलसिलेवार अपराधों से जाहिर है दो नंबर के हथियारों पर नकेल में कसावट नहीं है। इनकी दम पर क्रिमनल्स खुलेआम कत्ल, लूट कर रहे हैं। पिछले १० दिन में शहर और देहात में अपराधियों ने संगीन अपराधों में इनका खुलकर इस्तेमाल किया है। जबकि पुलिस खरगोन, खण्डवा से देसी हथियार लेकर आने वाले पैडलर्स को पकड़ कर अवैध हथियारों के कारोबार पर शिकंजे की दंभ भी भर रही है।
अपराधी पकड़े हथियार कहां से आए नहीं पता
महीने की शुरूआत से अभी तक १० दिन में पुलिस के खाते में दो कत्ल, हत्या के प्रयास समेत लूट की तीन वारदातें आई हैं। खासबात है दहशत फैलाने वाले इन सभी अपराधों को देसी गन के प्वाइंट पर अंजाम दिया गया है। यह पहली बार नहीं है जब अपराधियों ने इन हथियारों के बूते पर खून खराबा किया है। खासबात है कुछ वारदातों का खुलासा हुआ भी है, लेकिन उन्हें अंजाम देने वालों से यह नहीं उगलवाया गया अपराध में इस्तेमाल हथियार और गोलियां किस जरिए आईं। जबकि दो नंबर के हथियारों के कारोबार को प्रदेश स्तर पर बस्र्ट करने के लिए एसटीएफ और पुलिस एंड यूजर तक पहुंचने की प्लानिंग कर चुकी है। तय किया था, इन हथियारों का इस्तेमाल करने वालों से यह उगलवाना होगा कि अवैध हथियार और उनमें इस्तेमाल गोलियां कहां से आई हैं। क्योंकि देसी पिस्टल तंमचे तो बनाए जा सकते हैं, लेकिन कारतूस नहीं बनाए जा सकते। बिना बुलट के गन के इस्तेमाल का कोई मतलब नहीं है। लेकिन पुलिस इसी सवाल पर अपराधियों का मुंह नहीं खुलवा पाई है।
कहां से आती गोलियां पहेली बना धंधा
सिलसिलेवार वारदातों में अपराधियोंं ने अवैध हथियारों का इस्तेमाल किया है। जाहिर है न तो देसी हथियारों के कारोबार पर काबू है न उनमें इस्तेमाल होने वाली गोलियों के बारे हिसाब किताब है। जबकि हाल में पुलिस ने खण्डवा खरगोन से ही देसी पिस्टल लाने वाले तस्करों को पकड़ा है। उनसे अवैध पिस्टल की खेप के साथ कारतूस भी पकड़े और खुलासा भी किया कारतूस इन हथियारों की टेस्टिंग के लिए हैं। लेकिन कारतूस कहां से आए इंवेस्टीगेशन कभी कारगर नहीं हुई।
धंधे की जड़
शहर और गांवों में देसी हथियार बेचने वालों के एजेंट मौजूद हैं। उनके जरिए अपराधियों को घातक हथियार आसानी से सस्ते दाम पर मिलते हैं। हथियार बनाने वाले आर्डर के बाद खरीदार के ठिकाने तक हथियार पहुंचाने की सहूलियत तक मुहैया करा रहे हैं।
यह मानते हैं जानकार
देसी पिस्टल, तमंचे खरगोन, खण्डवा, यूपी में एटा और इटावा से आते हैं। यह सबको मालूम है। इन्हें बनाने के लिए बड़े कारखाने तो लगे नहीं हैं। गिने चुने सिकलीगर यह हथियार बना रहे हैं। फिर उन्हें पकड़ा क्यों नहीं जाता। इस धंधे को बस्र्ट करना है तो कारतूसों के धंधे पर नजर क्यों नहीं रखी जाती। १२ बोर के कारतूस तो रिफिल हो जाते हैं। लेकिन ३१५ और ३२ बोर के कारतूस को आयुद्ध कारखाने में ही बनते हैं। उन्हें लाइसेंसीशस्त्र धाराकों को ही दिया जाता है। उन्हें आवंटित कारतूसों की क्रास चेकिंग क्यों नहीं होती।
जेपी शर्मा रिटायर्ड एसपी