
Dabra's 'Kali Mooch' Rice on the Verge of Extinction- Demo pic
Kali Mooch Rice- ग्वालियर के डबरा की शान और पहचान माना जाने वाला प्रसिद्ध ‘काली मूछ’ चावल आज धीरे-धीरे इतिहास बनने की कगार पर है। कभी अपनी प्राकृतिक सुगंध और बेहतरीन स्वाद के कारण यह चावल पहली पसंद हुआ करता था। इसकी खुशबू से रसोइयां महक उठती थीं और दूर-दराज के बाजारों तक इसकी मांग रहती थी लेकिन अब उत्पादन में भारी गिरावट, बदलती गुणवत्ता और नकली बिक्री के कारण यह विरासत फसल तेजी से गायब हो रही है। ‘काली मूछ’ चावल की पहले 30-40 हजार हेक्टेयर में खेती होती थी जबकि अब केवल डेढ सौ हेक्टेयर में ही हो रहा है। इसकी पैदावार कम है और कीटों का प्रकोप अधिक होता है। इस प्रकार लागत ज्यादा और मुनाफा कम हो रहा है। बासमती की बढ़ती मांग से खेती में बदलाव आ गया है। हाल ये है कि बाजार में ‘काली मूछ’ के नाम से नकली चावल की बिक्री की जा रही है।
विशेषज्ञों और व्यापारियों के अनुसार अब काली मूछ चावल का दाना पहले जैसा पतला और चमकदार भी नहीं रहा, बल्कि मोटा हो गया है। इतना ही नहीं, इसकी प्राकृतिक खुशबू भी लगभग खत्म हो चुकी है। यही वजह है कि उपभोक्ताओं ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है। हालात यह हैं कि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से लाया गया साधारण चावल कृत्रिम सुगंध मिलाकर ‘काली मूछ’ के नाम से बेचा जा रहा है, जिससे असली चावल की साख को बड़ा नुकसान पहुंचा है। कभी डबरा क्षेत्र में हजारों हेक्टेयर में होने वाली इस पारंपरिक धान की खेती अब सिमटकर बेहद कम रह गई है।
गल्ला व्यापार संघ अध्यक्ष मुन्ना लाल गुप्ता के अनुसार वर्तमान में इसकी खेती लगभग डेढ़ सौ हेक्टेयर में ही हो रही है, जबकि पहले 40 हजार हेक्टेयर तक इसका रकबा हुआ करता था। बासमती चावल की बढ़ती मांग और अधिक लाभ के कारण किसानों का रुझान दूसरी किस्मों की ओर हो गया है।
स्थानीय किसान ध्यानेंद्र सिंह बताते हैं कि कम उत्पादन और घाटे के कारण उन्होंने भी बासमती की खेती शुरू कर दी है, क्योंकि उसमें जोखिम कम और आमदनी ज्यादा है। दाना भी पहले जैसा पतला व चमकदार नहीं रहा।
थोक व्यापारी नीरज दौलतानी बताते हैं कि असली काली मूछ चावल अब नहीं मिलता है। उत्तर प्रदेश से काली मूछ से मिलता-जुलता चावल आता है, उसे ही बेचा जा रहा है। डबरा का जो काली मूछ चावल है उसका उत्पादन सीमित हो गया है। जो किसान काली मूछ पैदा कर रहे है उनको खरीदार नहीं मिल रहे,क्योंकि बाजार में 125 से 150 रुपए किलो तक बेचा जा रहा है, इसलिए हर कोई खरीदता नहीं है। किसानों का कहना है कि काली मूंछ धान की पैदावार कम होती है, कीटों का प्रकोप ज्यादा रहता है और लागत भी अधिक आती है।
Published on:
23 Mar 2026 11:01 am
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