
Engineer prepared special flashlight to help security forces, soldiers will be able to see even one km away
ग्वालियर। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र राज्यों में सरकार के साथ मिलकर जीपीएस तकनीक को बेहतर करने के लिए सलाहकार के रूप में काम कर रहे शहर के इंजीनियर ने विशेष टॉर्च बनाई है। एक किलोमीटर तक फोकस होने के कारण यह टॉर्च पुलिस, सेना, फॉरेस्ट, माइनिंग सहित अन्य अद्र्ध सैनिक बलों की गश्ती क्षमता बढ़ाने में काम आ सकती है। खास बात यह है कि सौर ऊर्जा और बिजली से चार्ज होने वाली इस टॉर्च में अन्य फ्लैश लाइट टॉर्चों की तुलना में वजन बेहद कम है और इसका उपयोग सिग्नल देने या रात में पढ़ाई के लिए भी किया जा सकता है। टॉर्च को तैयार करने वाले इंजीनियर का कहना है कि वर्तमान में इसका उपयोग छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने शुरू कर दिया है और मध्यप्रदेश के बालाघाट और छिंदवाड़ा जिले में भी फॉरेस्ट डिपार्टमेंट इसका उपयोग कर रहा है।
यह है विशेष टॉर्च
-इंजीनियर ने तीन साल तक लगातार मेहनत करके फ्लैश लाइट टॉर्च को अपग्रेड किया है।
-फोकस के लिए टॉर्च में 15 वाट की एलईडी लगी है और वजन कम रखने के लिए एल्यूमिनियम की बॉडी है।
-रात में इस टॉर्च से एक हजार मीटर तक लक्ष्य को देख सकते हैं।
-पॉवर देने के लिए टॉर्च में ड्राय लिथियम बैटरी का इस्तेमाल किया गया है।
-अन्य टॉर्च में जहां बैटरी का वजन ज्यादा होता है, वहीं इस टॉर्च की बैटरी 20 से 30 ग्राम वजन की है।
यह है फायदा
-देर रात गश्त के समय लंबी दूरी तक दो रंगों में सिग्नल भी दे सकते हैं।
-टॉर्च को बिजली विहीन क्षेत्रों में सौर ऊर्जा से चार्ज किया जा सकता है।
-एक जगह से दूसरी जगह जाते समय कार के चार्जर से भी टॉर्च की बैटरी चार्ज हो सकती है।
-टॉर्च की बैटरी से मोबाइल फोन की बैटरी चार्ज हो सकती है।
-कम वजन होने से गश्त के समय अन्य सामान के साथ ले जाने में आसान है।
इसमें भी आ सकती है काम
-सुदूर क्षेत्रों मेंं खेती की रखवाली के लिए किसान इसका उपयोग कर सकते हैं।
-टॉर्च में स्पेशल लैंस होने के कारण इसका उपयोग रात में पढ़ाई के लिए भी किया जा सकता है।
-सुरक्षा बल द्वारा टॉर्च को घने जंगलों में नक्शा देखने में उपयोग किया जा सकता है।
वन विभाग कर रहा इस्तेमाल
रात में दूर तक साफ देखने के लिए छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने टॉर्च का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इसके लिए वन रक्षकों को प्रशिक्षण भी दिलाया गया है, ताकि उपयोग में आसानी हो। इसके अलावा मध्यप्रदेश के बालाघाट और छिंदवाड़ा जिले में भी रात्रि गश्त के समय वन कर्मी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
-जीपीएस टैक्नौलॉजी को लेकर हम पहले से ही काम कर रहे हैं। जीपीएस को लेकर प्रशिक्षण देने के लिए जाते समय जवानों की सुविधा का ख्याल दिमाग में आया, फिर इस पर काम किया और तीन साल की मेहनत के बाद यह टॉर्च तैयार हुई है।
-विवेक दीक्षित, जीपीएस कंसल्टैंट
Published on:
29 Oct 2019 07:59 pm
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