ग्वालियर। श्योपुर में नहर के पास गुरुशरण कौर के नाम पर रही एक 63 बीघा जमीन अपर कलेक्टर की जांच में बनी हुई है। यह जांच एसडीएम श्योपुर आरके दुबे के उस आदेश के खिलाफ की जा रही है, जिसमें एसडीएम ने गुरुशरण कौर का वारिस बिना समयावधि आवेदन किए ही खुशवंत सिंह को बना दिया गया है और इस पर वर्ष1990 से 2000 के दशक के बीच धारा 190 में मालिक बने आधा दर्जन लोगों के अधिकारों को खारिज कर दिया है।
लोगों के आवेदन पर अपर कलेक्टर से कलेक्टर पीएल सोलंकी द्वारा जांच कराई जा रही है। मामले में दो दिन बाद अपर कलेक्टर वीरेन्द्र सिंह के द्वारा जांच रिपोर्ट पेश की जाएगी, स्थिति तभी साफ हो सकेगी। मगर इस संबंध में पड़ताल करने पर जहां एसडीएम के आदेश में कई खामियां जानकारों के द्वारा गिनाई गई हैं।
एसडीएम के आदेश से गुरुशरण कौर की जमीन का आधा हिस्सा अन्य लोगों के नाम पर जाना भी जानकारों ने अनुचित ठहराया है। वहीं एसडीएम के आदेश अनुसार धारा 190 का प्रभाव गुरुशरण कौर की जमीन पर इसलिए प्रभावी नहीं होती है क्योंकि वह एनआरआई(कनाडा निवासी) और विधवा महिला थी। और नियम के मुताबिक विधवा महिला पर धारा 168,190 प्रभावी नहीं होती है।
जानकारों के अनुसार ऐसे में यह भूमि शासकीय होना थी, क्योंकि निश्चित अवधि और नियम के अंतर्गत खुशवंत सिंह ने इस मामले में पक्षकार बनने के लिए आवेदन पेश नहीं किया।
इसलिए खड़े हो रहे सवाल
1. एसडीएम के आदेश में आदेश में पंचनामा, पटवारी रिपोर्ट, शपथ-पत्र खुशवंत सिंह का जिक्र मगर संलग्न नहीं।
2. दो भाई खुशवंत सिंह, कमलजीत सिंह की तरफ से पुत्रगण होना बताया मगर आदेश खुशवंत सिंह के नाम नामान्तरण का किया गया।
3. किसी पेशी पर दोनों भाइयों के दस्तखत नहीं।
4. बिना आवेदन सभी 4 प्रकरण और नए को एक कर सुना गया। जबकि मामला सिर्फ तहसीलदार के यहां वर्ष 13 में लगे वारिस हक की अपील का था।
(नोट-यह सवाल पक्षकार के वकील गजानन्द राठौर के अनुसार हैं।)
62 लाख में बिकी जमीन
प्रकरण की खासबात यह भी है कि खुशवंत सिंह के नाम पर आने के बाद जमीन का विक्रय हो गया है। जिन लोगों ने जमीन क्रय की है, उन्होंने इसे कलेक्टर गाइड लाइन से आधी से भी कम कीमत पर क्रय किया गया है। मगर इसके बाद भी सब रजिस्ट्रार के द्वारा इसपर ऑव्जेक्शन नहीं लिया गया है। जबकि नियमानुसार स्टांप चोरी की स्थिति में सब रजिस्ट्रार को ही संज्ञान लेना होता है। बताया गया है कि भूमि करीब 62 लाख में बिकी है और गाइड लाइन अनुसार इसकी कीमत 4 करोड़ से अधिक बनती है।
निराकरण को रेवेन्यू बोर्ड गया प्रकरण
बताया जा रहा है कि वर्ष 2013 में खुशवंत सिंह ने जब स्वयं को गुरुशरण कौर का वारिस बताते हुए तहसीलदार श्योपुर के यहां आवेदन पेश किया। तब यह प्रकरण रैवेन्यु बोर्ड में गुरुशरण कौर की तरफ से केस लडऩे को दी गई पावर ऑफ अटोर्नी की अपील में थे। अभिभाषक राठौर के अनुसार प्रकरण में दो पावर ऑफ अटॉर्नी लगाई गई, जिनमें दोनों में पासपोर्ट की डेट अलग अलग थी और उसी के समाधान के लिए रैवेन्यु बोर्ड प्रकरण गए थे, जहां से इन्हें गुरुशरण कौर की मृत्यु बाद वापस कर दिया गया।