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गुरु गोविंद सिंह ने की थी खालसा पंथ की स्थापना

सिखोंके दसवे गुरु गोविंद सिंह महानयोद्धा, कवि, भक्तव आध्यात्मिक नेता भी थे।उन्होंने ही सिखों की पवित्रगंथ गुरु ग्रंथ साहिब कोपूरा किया व उन्हें गुरुरूप में सुशोभित किया। बिचित्रनाटक को माना जाता है उनकीआत्मकथा।

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rishi jaiswal

Jan 04, 2017

guru govind singh jayanti

guru govind singh jayanti

ग्वालियर।सिखों के दसवें गुरु गोविंदसिंह जी का जन्म पौष शुदि सप्तमीसंवत 1723 (22 दिसंबर,1666) को पटना शहर मेंगुरु तेग बहादुर और माता गुजरीके घर हुआ। गुरु गोविंद सिंहके जन्म उत्सव को 'गुरुगोविंद जयंतीÓ केरूप में मनाया जाता है। इस शुभअवसर पर गुरुद्वारों में भव्यकार्यंक्रम सहित गुरु ग्रंथसाहिब का पाठ किया जाता है।और सामूहिक भोज (लंगर)का आयोजन किया जाताहै।

पिता गुरुतेग बहादुर की मृत्यु के उपरांत 11 नवम्बर सन1675 को वे गुरु बने।वह एक महान योद्धा, कवि,भक्त व आध्यात्मिकनेता थे। सन 1699 में बैसाखी केदिन उन्होने खालसा पंथकी स्थापना की, जोसिखों के इतिहास की सबसेमहत्वपूर्ण घटना मानी जातीहै।

गुरुगोबिन्द सिंह ने सिखों कीपवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथसाहिब को पूरा किया वउन्हें गुरु रूप में सुशोभितकिया। बिचित्र नाटक कोउनकी आत्मकथा माना जाता है।यही उनके जीवन के विषय मेंजानकारी का सबसे महत्वपूर्णस्त्रोत है। यह दसम ग्रन्थ काएक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरुगोबिन्द सिंह की कृतियों केसंकलन का नाम है।

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उन्होनेमुगलों या उनके सहयोगियों(जैसे, शिवालिकपहाडियों के राजा) केसाथ 14 युद्ध लड़े। धर्म केलिए समस्त परिवार का बलिदानउन्होंने किया, जिसकेलिए उन्हें 'सरबंसदानी'भी कहा जाता है। इसकेअतिरिक्त जनसाधारण में वेकलगीधर, दशमेश,बाजांवाले आदि कई नाम,उपनाम व उपाधियों सेभी जाने जाते हैं।

गुरुगोविंद सिंह जहां विश्व कीबलिदानी परम्परा में अद्वितीयथे, वहीं वे स्वयंएक महान लेखक, मौलिकचिंतक तथा कई भाषाओं के ज्ञाताभी थे। उन्होंने स्वयं कईग्रंथों की रचना की। वे विद्वानोंके संरक्षक थे। उनके दरबारमें 52 कवियों तथालेखकों की उपस्थिति रहती थी,इसीलिए उन्हें 'संतसिपाही'भी कहा जाताथा। वे भक्ति व शक्ति के अद्वितीयसंगम थे।



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गुरुगोविंद सिंह जब पैदा हूए थेउस समय उनके पिता असम मेंधर्म उपदेश को गये थे। उन्होंनेबचपन मे फारसी, संस्कृत कीशिक्षा ली और एक योद्धा बननेके लिए सैन्य कौशल सीखा। गुरुगोबिंद सिंह जी का विवाह सुंदरीजी से 11 साल की उम्रमें 1677 में हुआ। उनकेचार पुत्र साहिबज़ादा अजीतसिंह, जूझार सिंह,जोरावर सिंह और फतेहसिंह थे। सन् 1699 कोबैसाखी वाले दिन गुरुजी पंजप्यारों से अमृत छक कर गोविंदराय से गुरु गोविंद सिंह जीबन गए। उनके बचपन के पाँच सालपटना में ही गुजरे।

1675 कोकश्मीरी पंडितों की फरियादसुनकर गुरु तेगबहादुर जी नेदिल्ली के चाँदनी चौक मेंबलिदान दिया। गुरु गोबिंदसिंह जी 11 नवंबर1675 को गुरु गद्दीपर विराजमान हुए।

धर्मएवं समाज की रक्षा हेतु हीगुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699. में खालसापंथ की स्थापना की। पांच प्यारेबनाकर उन्हें गुरु का दर्जादेकर स्वयं उनके शिष्य बन जातेहैं और कहते हैं-जहाँपाँच सिख इक_े होंगे,वहीं मैं निवास करूंगा।उन्होंने सभी जातियों केभेद-भाव को समाप्तकरके समानता स्थापित की औरउनमें आत्म-सम्मानकी भावना भी पैदा की।



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गुरुगोविंद सिंह के बारे में कुछखास बातें...

एकपुत्र के रूप में :- आपकेजीवन के बारे में लिखते समययह समझ में नहीं आता है कि आपकाजीवन किस पक्ष में लिखा जाए। अगर आपको एक पुत्र के रूप मेंदेखा जाए तो आपके जैसा कोईपुत्र नहीं जिसने अपने पिताको हिंदू धमज़् की रक्षा केलिए शहीद होने का आग्रह कियाहो।

एकपिता के रूप में :- अगरआपको पिता के रूप में देखेंतो भी आपके जैसा महान पिता कोईनहीं, जिन्होंनेखुद अपने बेटों को शस्त्र दिएऔर कहा कि जाओ मैदान में दुश्मनका सामना करो और शहीदी जाम कोपिओ।

एकलेखक के रूप में :- अगरआपको लिखारी के रूप में देखाजाए तो आप धन्य हैं। आपका दसमग्रंथ, आपकी भाषा,आपकी इतनी ऊंची सोचको समझ पाना आम बात नहीं है।

एकयोद्धा के रूप में :- अगरआपको एक योद्धा के रूप मेंदेखें तो ?हैरानीहोती है कि आपने अपने हर तीरपर एक तोला सोना लगवाया हुआथा। जब इस सोने का कारण आपसेसिखों ने पूछा कि मरते तो इससेदुश्मन होते है फिर ये सोनाक्यों?

तोआपका उत्तर था कि मेरा कोईदुश्मन नहीं है। मेरी लड़ाईजालिम के जुल्म के खिलाफ है।इन तीरों से जो कोई घायल होंगेवो इस सोने की मदद से अपना इलाजकरवा कर अच्छा जीवन व्यतीतकरें और अगर उनकी मौत हो गई तो उनका अंतिम संस्कार हो सकें।

एकत्यागी के रूप में :- अगरएक त्यागी के रूप में आपकोदेखा जाए तो आपने आनंदपुर केसुख छोड़, मां कीममता, पिता का साया,बच्चों के मोह को आसानीसे धमज़् की रक्षा के लिए त्यागदिया।

एकगुरु के रूप में :- आपकेजैसा गुरु भी कोई नहीं जिसनेअपने को सिखों के चरणों मेंबैठकर अमृत की दात मंगाई औरवचन किया कि मैं आपका सेवक हूंजो हुकूम दोगे मंजूर करूंगा। समय आने पर आपने सिखों केहुकूम की पालना भी की।

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