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‘Lenin ने तिलक की फांसी रूकवाने के लिए अंग्रेजी सरकार पर बनाया था दबाव’, भारत में साम्यवाद का क्या रहा योगदान, वामपंथ के जानकारों से समझिए

Lenin Death Anniversary : रूसी क्रांति के जनक लेनिन की मृत्यु को आज 102 वर्ष हो गए। लेनिन की मौत के अगले साल भारत में पहली वामपंथी पार्टी का गठन हो गया था। वामपंथी आंदोलन का भारत में क्या हासिल रहा, आइए विस्तार से जानते हैं।

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Lenin Death Anniversary

रूसी क्रांति के जनक लेनिन

Lenin's death anniversary : रूसी क्रांति के जनक व्लादिमीर लेनिन (Vladimir Lenin) की मृत्यु 21 जनवरी 1924 को लंबी बीमारी के बाद 53 वर्ष की आयु में हो गई थी। उन्हें इस दुनिया से गुजरे हुए 102 वर्ष हो गए लेकिन आज भी वामपंथी पार्टियां और उनके कार्यकर्ता समाजवादी या बराबरी का समाज बनाने की लड़ाई में मुस्तैदी से लगे हैं।

Left movement in India : लेनिन के नेतृत्व में जार की स्वेच्छाचारी व्यवस्था को खत्म करके रूसी सोवियत संघात्मक समाजवादी गणराज्य की स्थापना 1917 में की गई। 1950 तक आते-आते दुनिया के बहुत सारे देशों में साम्यवादी सरकारों की स्थापना हो गई। वहीं दुनिया में आज सिर्फ पांच देशों चीन, उत्तर कोरिया, लाओस, क्यूबा और वियतनाम में साम्यवादी सरकारें हैं। भारत में साम्यवादी विचारधारा की वाहक वामपंथी दलों की समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने की लड़ाई कहां तक पहुंची? इस मुद्दे पर पत्रिका ने लेखकों, प्रोफेसर और वामपंथी नेताओं से बातचीत की। विस्तार से पढ़ें।

लेनिन ने महिलाओं को दिलाए ये सारे अधिकार

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (AIPWA) की महासचिव मीना तिवारी ने पत्रिका से बातचीत में कहा, लेनिन ने ही दुनिया में सबसे पहले महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाया। वोट देने का अधिकार, संपत्ति में महिलाओं को अधिकार, बराबर काम के लिए समान वेतन का अधिकार, बुजुर्गों और बच्चों की जिम्मेदारी की सामाजिक जवाबदेही यानी सरकार की जिम्मेदारी बनाने का काम भी सबसे पहले सोवियत संघ में ही हुआ था।

'देश में गरीब और मजदूर के हक की सबसे मुखर आवाज वामपंथ ही है'

दुनिया में वामपंथी सरकारें कम होती जा रही हैं? इस पर मीना (Meena Tiwari, General Secretary, AIPWA) कहती हैं, '70 वर्षों में सोवियत संघ ढह गया तो उससे सबक लेने की जरूरत है। 100 वर्ष पहले जब कम्युनिस्ट पार्टी का भारत में गठन हुआ था तब भारत की परिस्थितियां भिन्न थीं। अंग्रेजों की सरकार थी। आजादी हासिल करने की लड़ाई में वामपंथी संगठनों ने सक्रिय तरीके से भाग लिया था। भारत के संविधान में लोकतांत्रिक अधिकारों के पीछे वामपंथी आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही। आजादी के बाद भी वामपंथी पार्टियां ही गरीब, किसान, मजदूरों के लिए अगर कोई पार्टी सबसे ज्यादा मुखर रही हैं।'

कवि, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, राष्ट्रीय सचिव, प्रगतिशील लेखक संघ विनीत तिवारी (Vineet Tiwari, National Secretary, Progressive Writers Association ) से यह पूछे जाने पर कि भारत में वामपंथ पार्टी की स्थापना के 100 वर्ष बीत जाने के बाद अब क्या हालात हैं, के जवाब में वह कहते हैं, 'भारत के वामपंथी आंदोलन को समूचे दक्षिण एशिया की विश्व शांति आंदोलन में अगुआई करने की ज़रूरत है क्योंकि यूरोपीय साम्राज्यवाद ढह चुका है और अमेरिकी साम्राज्यवाद का पतन तेज़ी से हो रहा है। ऐसे में एक बेहतर और अधिक मानवीय विश्व के निर्माण में लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के देशों, तथा चीन के साथ मिलकर भारत को नयी दुनिया के निर्माण की चुनौती को स्वीकार करना चाहिए।

क्या विश्व में समाजवादी व्यवस्था को लेकर क्या माहौल दिख रहा है?

इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि इस समय लगभग पूरे विश्व में दक्षिणपंथ और फ़ासीवाद सर्वाधिकारवाद क्रूरता के साथ आगे बढ़ रहा है। यही हालात भारत में भी है। हिटलर के वक़्त भी यह लोकतंत्र की आड़ में हुआ था और भारत में भी यही हो रहा है।

क्या भारत में साम्यवाद की जमीन खिसकती हुई नजर आ रही है?

Left Movement in India's History : भारत में वामपंथ ने न तो आत्मसमर्पण किया है और न ही कहीं लड़ाई में पीछे हटे हैं। संसदीय लोकतंत्र और पूंजीवाद की तमाम बुराइयों की घुसपैठ हो जाने के बाद भी जहाँ वामपंथ रहा, लोगों को समान अवसर मिले, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार की बेहतर व्यवस्थाएँ हासिल हुईं। अपने तमाम विकारों और पराजयों के बावजूद भारत में वामपंथ अभी भी ग़रीबों, वंचितों और शोषितों का सबसे विश्वसनीय परचम है।

'भारत में वामपंथी आंदोलन में जाति नहीं स्त्री प्रश्न की उपेक्षा हुई है'

भारत में वामपंथी आंदोलन पर एक इल्ज़ाम जाति के प्रश्न की उपेक्षा का है। यह मुझे सही नहीं लगता, लेकिन मैं लगातार देख रहा हूं कि अनेक कमज़ोर वैचारिकी वाले वामपंथी इस इल्ज़ाम को सच मान लेते हैं। बल्कि अगर उपेक्षा हुई है तो स्त्री प्रश्न की अधिक हुई है।

मनरेगा, सूचना के अधिकार जैसे कानून वामपंथी दलों के दबाव में बने

वरिष्ठ पत्रकार, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता झा (Nivedita Jha, Social Activist) का मानना है कि भारत में वामपंथ के प्रभाव को आजादी के बाद से देखा जाना चाहिए। उन्होंने पत्रिका से बातचीत में कहा कि आजादी के बाद देश के कुछ हिस्सों में वामपंथ तेजी से फैला और कुछ राज्यों में सरकारें बनी या फिर विपक्ष में कई लोग जीतकर गए। देश में कई बड़े आंदोलन वामपंथी दलों ने किए। आंदोलनों के चलते कई मोर्चों पर हालात भी बदले। मजदूरों को लेकर श्रम कानून भी वामपंथी आंदोलनों के चलते बने। समता और समानता की लड़ाई में साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव रहा। सूचना के अधिकार, मनरेगा, भूमि सुधार को लेकर जो कानून बने, उनमें वामपंथी विचारों का हाथ रहा।

'बराबरी तो आ ही नहीं सकती, इस विचार को फैलाया जा रहा है'

क्या वामपंथ आंदोलनों को कुचलने की हाल, फिलहाल में ​कोशिश की गई है? इस प्रश्न के जवाब में राजनीतिक इतिहासकार प्रो. शम्सुल इस्लाम (Proff. Shamsul Islam) का कहना है कि 2018 में जब त्रिपुरा में वामपंथी सरकार सत्ता से बाहर हुए तब हिंदुत्ववादियों की सरकार बनी। उन्होंने सबसे पहले लेनिन की मूर्ति गिराई। दक्षिणपंथ के लोग यह प्रचारित और प्रसारित करते हैं कि समाजवाद बहुत बुरी चीज है और बराबरी तो आ ही नहीं सकती है। इस विचार से इस समय दुनिया की बड़ी आबादी ग्रसित हो चुकी है।

लेनिन का भारत की आजादी को लेकर क्या विचार रहा?

उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में अकेले लेनिन ही एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने भारत की आजादी का समर्थन किया था। लेनिन ही थे जिन्होंने बाल गंगाधर तिलक पर अंग्रेजी सरकार द्वारा फांसी की सजा दिलाने के लिए चलाए गए मुकदमे का विरोध किया था। लेनिन थे जिन्होंने भगत सिंह के बारे में वक्तव्य दिया था। लेनिन ही थे जिन्होंने कहा था कि रूस की क्रांति से भारत का काम नहीं चलेगा, उन्हें अपने यहां क्रांति लानी होगी।

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