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GDA में पूर्व सीईओ के फर्जी साइन के आधार पर आवंटित कर दिए 150 प्लॉट

GDA में पूर्व सीईओ के फर्जी साइन के आधार पर आवंटित कर दिए 150 प्लॉट

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GDA में पूर्व सीईओ के फर्जी साइन के आधार पर आवंटित कर दिए 150 प्लॉट

ग्वालियर. ग्वालियर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों व कर्मचारियों ने प्राधिकरण को घोटालों का प्राधिकरण बना दिया है। इस सरकारी एजेंसी से लोग प्लॉट लेने से भी घबराने लगे हैं। यहां पदस्थ अधिकारी अपने ही संस्थान को डूबोने में लगे हैं। सिरोल की मामा माणिकचंद वाजपेयी योजना हो या अन्य योजनाएं जीडीए अफसरों की भूमिका अच्छी नहीं रही हैं। कलेक्टर ने हाल ही में ग्वालियर गृह निर्माण एवं अशोक गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं को भूखंड आवंटित करने का घोटाला उजाकर होने के बाद इसकी जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। यह घोटाला पूर्व सीईओ एमपी वत्स के फर्जी हस्ताक्षर कर किया गया है।

आनंद नगर एवं शताब्दीपुरम योजना में अशोक गृह निर्माण सहकारी समिति एवं ग्वालियर गृह निर्माण सहकारी समिति को आवास नीति 1995 के दिए गए निर्देशों से ज्यादा भूखंड फर्जी तरीके से जीडीए अधिकारी द्वारा आवंटित कर दिए गए। इस मामले में हो रही गड़बड़ी पर आरटीआई कार्यकर्ता राकेश सिंह कुशवाह ने जीडीए के सीईओ को एक आवेदन देकर उन्हें भूखंड आवंटित नहीं करने की मांग की थी। जीडीए से आरटीआई के तहत ली गई जानकारी के अनुसार ग्वालियर गृह निर्माण समिति को आनंद नगर योजना में 28 अक्टूबर 97 को 12 प्लाट आवंटित किए गए। इसी दिनांक को इसी समिति को कुल 150 प्लॉट आवंटित करने की जानकारी भी प्राधिकरण द्वारा दी गई। इन प्लाटों का आवंटन तत्कालीन सीईओ एमपी वत्स द्वारा दिया गया होना बताया गया है। जबकि वत्स ने शपथ पत्र में बताया है कि उन्होंने आनंद नगर योजना के अलावा किसी भी योजना में इन संस्थाओं को प्लाट आवंटित नहीं किए हैं।

उच्च न्यायालय भी लगा चुका है रोक
शंकरपुर के एक जमीन विवाद में उच्च न्यायालय द्वारा प्लाटों के क्रय विक्रय पर रोक लगाई जा चुकी है। उच्च न्यायालय ने आनंदनगर में जीडीए द्वारा सहकारी समितियों को दिए गए प्लाट्स को बेचे जाने तथा उनकी रजिस्ट्री पर रोक लगाई है। यह रोक 74 बीघा जमीन के विवाद के मामले में लगी है। जिसमें मेजर करतार सिंह द्वारा 1997 में ग्वालियर गृह निर्माण समिति, मॉडर्न गृह निर्माण समिति तथा अशोक गृह निर्माण समिति के बीच जमीन की खरीदी के लिए केवल एग्रीमेंट हुआ था। यह एग्रीमेंट मूर्त रूप नहीं ले सका था लेकिन इन समितियों ने एग्रीमेंट के आधार पर ही उक्त जमीन जीडीए को समर्पित कर दी थी जबकि वे उसकी मालिक नहीं थी और जीडीए ने भी उसका स्वामित देखे बिना जमीन को विकसित कर इसके एवज में उक्त प्लॉट इन समितियों को दे दिए।