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मध्यभारत की राजधानी थी ग्वालियर, मोतीमहल में लगती थी विधानसभा

1100 छोटे-बड़े कमरों में से 300 में संचालित हैं सरकारी दफ्तर

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मध्यभारत की राजधानी थी ग्वालियर, मोतीमहल में लगती थी विधानसभा

मध्यभारत की राजधानी थी ग्वालियर, मोतीमहल में लगती थी विधानसभा

ग्वालियर.

देश आजाद होने के बाद से रियासतें खत्म होना शुरू हो गई थीं। 28 मई 1948 को एक नए राज्य ने जन्म लिया, जिसका नाम था 'मध्य भारतÓ। इस मध्य भारत की राजधानी ग्वालियर को बनाया गया था और शासक जीवाजी राव सिंधिया को राज प्रमुख का दर्जा दिया गया। इसका गवाह शहर के बीचोंबीच स्थित मोतीमहल है। यहां स्थित दरबार हॉल से विधानसभा चलती थी। मोतीमहल के पूरे परिसर में 1100 छोटे-बड़े कमरे हैं। इसकी रौनक आज भी देखते बनती है। मोतीमहल देखने के लिए आज भी पर्यटक पहुंचते हैं।

मोतीमहल के दरबार हॉल में चढ़ी है सोने की परत
दौलतराव सिंधिया ने 1825 में पूना के पेशवा पैलेस की तर्ज पर मोतीमहल को बनवाया था। इसके हॉल में कई किलो सोना लगाकर छत और दीवारों को सजाया गया है। इस महल के कई कमरों में राग-रागिनी के ऊपर बनी पेटिंग बनाई हुई हैं। जब भोपाल राजधानी बना, तो मोतीमहल में राज्य सरकार के कई दफ्तर आ गए। आज भी इस बिल्डिंग के 300 कमरों का उपयोग होता है।

आज भी संचालित होते हैं 50 से अधिक विभाग
भोपाल के राजधानी घोषित होने के बाद ग्वालियर का रुतबा कम ना हो, इसलिए ग्वालियर को आबकारी, परिवहन, भू अभिलेख के प्रदेश स्तरीय दफ्तर दिए गए। इसके अलावा नारकोटिक्स डिपार्टमेंट का केंद्रीय दफ्तर ग्वालियर में खोला गया। इसके साथ ही मप्र छत्तीसगढ़ का ऑडिट भवन भी ग्वालियर को दिया गया। आज भी मोती महल से 50 से अधिक विभाग संचालित किए जाते हैं। मोती महल की शान आज भी बरकरार है।

मई 2014 में हुआ था अग्निकांड
मोतीमहल में मई 2014 में भीषण अग्निकांड भी हुआ, जिसमें एक बड़ा हिस्सा गिर गया था, जिसे मूल स्वरूप में लाया गया। इसके लिए बाहर से कारीगर बुलाए गए थे और राजस्थान से पत्थर मंगाया गया था।

नोट: यह जानकारी इतिहासकारों के अनुसार दी गई है।