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जीवन जीने की पद्धति सुधारकर अपना लोक-परलोक सुधारें : वैंकटेश प्रपन्नाचार्य

- माहेश्वरी भवन की श्रीमद्भागवतकथा में कृष्ण-रुकमणि की मोहिनी सूरत देख श्रद्धालु मुग्ध

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जीवन जीने की पद्धति सुधारकर अपना लोक-परलोक सुधारें : वैंकटेश प्रपन्नाचार्य

जीवन जीने की पद्धति सुधारकर अपना लोक-परलोक सुधारें : वैंकटेश प्रपन्नाचार्य

ग्वालियर. माहेश्वरी भवन डीडवाना ओली में हो रही श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन भगवान श्रीकृष्ण और लक्ष्मी स्वरूपा रुकमणि की मोहिनी छवि देख श्रद्धालु मुग्ध हो गए। कृष्ण-रुकमणि के विवाह में श्रद्धालुओं ने बारात में शामिल होकर बैंडबाजों की धुन पर उल्लासित होकर नृत्य किया। मंगलवार को कथा का विश्राम दिवस है। इस मौके पर कृष्ण-सुदामा की कथा होगी। छठे दिन व्यासपीठ से कथा व्यास वैंकटेश प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि हमारा जीवन तो प्रभु के हाथ में हैं, लेकिन जीवन जीने की पद्धति हमारे हाथ में हैं, जिसे बेहतर बनाकर हम अपना लोक परलोक सुधार सकते हैं। उन्होंने कहा कि लोग अपने कर्मों की समीक्षा करने की बजाय दूसरे के गुणों-अवगुणों को देखा करते हैं। दूसरों की निंदा करने वाले कभी धार्मिक नहीं हो सकते हैं। जिस धर्म में कटुता है ऐसे धार्मिक लोगों से दूर रहें। हम अंत:करण की स्वच्छता नहीं करते और बाहर वाइपर घुमाते रहते हैं। जिस दिन सब अपनी-अपनी खुद की समीक्षा शुरू कर देंगे, सारा संसार ठीक हो जाएगा।

सज्जन के साथ सज्जनता तो दुर्जन के साथ दुर्जनता करती प्रवेश
प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि आप यदि कुटिल व्यक्ति के साथ रहोगे,तो एक दिन कुटिलता आपके भीतर प्रवेश करने लगेगी। सज्जनों के संग से सज्जनता और दुर्जनों के संग से दुर्जनता पैदा होती है। उन्होंने कहा कि क्रोध एक मानसिक बीमारी है। जो अपने परिजनों पर क्रोध करता है, वह बाहर भी वातावरण को दूषित करता है। भगवान जगन्नाथ भी 14 दिन तक क्वारंटीन रहते हैं, तो मनुष्य का बीमार होना स्वाभाविक है। कथा क्रोध का शमन करती है। लेकिन भगवत कृपा से ही कथा श्रवण का सौभाग्य मिलता है। उन्होंने बताया कि धुंधकारी को अपने पाप का स्मरण था, जबकि आज तो मनुष्य पाप करने के बाद स्वीकार भी नहीं करता है।

शरीर की सुंदरता तो नष्ट हो जाएगी
उन्होंने कहा कि शरीर की सुंदरता पर अहंकार मत करो क्योंकि यह शरीर तो नष्ट हो जाएगा, लेकिन बिना परमात्मा की कृपा के विवेक जाग्रत नहीं होता है। उन्होंने बताया कि देवताओं को अपनी आसक्ति में लेने काम को भी मद हो गया था। उन्होंने कृष्ण को रास में बुलाया, लेकिन काम विजेता के आगे काम नतमस्तक हो गया और उसने कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया।