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5 वर्ष में शिशु कुपोषण में 92 फीसदी की कमी, 11935 गम्भीर कुपोषित से अब रह गए सिर्फ 611

-शिशु मृत्यु दर घटकर रह गई 16 प्रतिशत-दूरस्थ अंचल में अभी भी चाहिए व्यवस्था बेहतर : बेहतर पोषण के लिए एनआरसी में भर्ती बच्चे

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5 वर्ष में शिशु कुपोषण में 92 फीसदी की कमी, 11935 गम्भीर कुपोषित से अब रह गए सिर्फ 611

5 वर्ष में शिशु कुपोषण में 92 फीसदी की कमी, 11935 गम्भीर कुपोषित से अब रह गए सिर्फ 611

श्योपुर। कुपोषण के लिए कुख्यात श्योपुर जिले के आदिवासी और सामान्य क्षेत्र में शिशु कुपोषण 92 फीसदी तक कम हुआ है। पांच वर्ष पहले यानि वर्ष 2019 में 11935 गंभीर कुपोषित बच्चे थे अब घटकर सिर्फ 611 रह गए हैं। महिला बाल विकास और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से दिसंबर 2022 तक 84 प्रतिशत बच्चों का जन्म संस्थागत प्रसव से हुआ। इसका परिणाम है कि अब शिशु मृत्यु दर भी घटकर 16 प्रतिशत हो गई है। जिले के कुल 80 हजार बच्चों में से अधिकतर सामान्य की श्रेणी में हैं। शिशु मृत्यु दर में कमी आने से लिंगानुपात भी बढ़कर 910 से 961 पहुंच गया है।


दरअसल, हाल ही में जिले में मातृ और शिशु मृत्युदर और कुपोषण को लेकर सर्वे कराया गया है। 7.3 लाख जनसंख्या में सामान्य सर्वे के साथ-साथ 1.2 लाख सहरिया आदिवासी समुदाय में बारीकी से सर्वे हुआ। इस सर्वे में यह सामने आया है कि सब मौढ़ा हमार मौढ़ा के नाम से हुए नवाचार ने कुपोषण को सुपोषण की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब पेसा एक्ट के माध्यम से शुरू हुई गतिविधियों में पोषण को भी शामिल किया गया है, जिससे महिलाएं और ज्यादा जागृत हुई हैं। तीन अतिरिक्त डिलेवरी पॉइंट शुरू होने से संस्थागत प्रसव का औसत बढ़ा है जिससे मातृ मृत्यु दर में भी कमी आई है।


यह है जिले की वर्तमान स्थिति
-कुल जनसंख्या 7.3 लाख है जिसमें 1.02 लाख सहरिया आदिवासी है .
-शून्य से 5 वर्ष तक के 80066 बच्चे हैं।
-अप्रैल 2019 में 2377 अति गंभीर कुपोषित बच्चे थे अब घटकर 115 रह गए हैं।
-अप्रैल 2019 में 11935 मध्यम गंभीर कुपोषित बच्चे थे, अब घटकर 611 रह गए हैं।
-मातृ मृत्युदर 37 प्रतिशत तक कम हो गई है।
-शिशु मृत्यु दर 16 प्रतिशत तक कम हो गई है।
-प्रति एक हजार बच्चों पर अब 961 बालिकाएं हैं।


हर वर्ष कम हुआ ग्राफ
-अप्रैल 2017 तक मेम बच्चे 15458 और सेम बच्चे 3391 थे।
-अप्रैल 2018 तक मेम बच्चे 12858 और सेम बच्चे 2533 थे।
-अप्रैल 2019 तक मेम बच्चे 5869 और सेम बच्चे 1588 थे।
-अप्रैल 2020 तक मेम बच्चे 3424 और सेम बच्चे 949 थे।
-अप्रैल 2021 तक मेम बच्चे 1920 और सेम बच्चे 511 थे।
-दिसंबर 2022 से अभी तक अब मेम बच्चे 688 और सिर्फ 144 सेम बच्चे हैं।
-मार्च 2023 में मेम बच्चे 611 और सेम बच्चे 115 रह गए हैं।


वर्सन
-कुपोषण को कम करने के लिए आदिवासी क्षेत्र पर लगातार फोकस रहा है। नए सर्वे में स्थिति और बेहतर हुई है। पांच वर्ष पूर्व जहां 11937 बच्चे मध्यम गंभीर कुपोषित थे, वहीं अब इनकी संख्या सिर्फ 611 रह गई है। जबकि सेम बच्चों की संख्या सिर्फ 115 रह गई है। हमारा लक्ष्य मध्यम और अति गंभीर बच्चों की संख्या को जीरो तक लाना है।
-ओपी पांडेय, डीपीओ-महिला बाल विकास
-बीते दो वर्षों में साप्ताहिक निगरानी पर फोकस रहा है। सख्ती की तो दूरस्थ क्षेत्रों में भी स्थितियों में सुधार आया। महिलाएं जागरूक हुई हैं तो पोषण आहार का सही उपयोग भी बढ़ा है। हालात सुधरे हैं और शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में भी लगातार कमी आ रही है। हम प्रयास कर रहे हैं कि श्योपुर कुपोषण शून्य जिला बने।
शिवम वर्मा, कलेक्टर