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अपनी मर्यादाओं का गुणगान करते रह गए, देश हित में देश का नुकसान करते रह गए

आइटीएम यूनिवर्सिटी में जमी मुशायरे की महफिल

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अपनी मर्यादाओं का गुणगान करते रह गए, देश हित में देश का नुकसान करते रह गए

अपनी मर्यादाओं का गुणगान करते रह गए, देश हित में देश का नुकसान करते रह गए

ग्वालियर.

आइटीएम यूनिवर्सिटी की अदबी पेशकश इस बार फिर अदब प्रेमियों के दिलों पर इश्क के रंग बिखेर गई। इबारत के इस पंद्रहवें अध्याय में उर्दू शायरी व हिंदी रचनाओं के मुख्तलिफ इश्क रंग देखने और सुनने को मिले। प्रेम, सद्भाव, निर्मल हास्य और भारतीयता के स्वरों में रंगी-रची शेरो सुखन की ये शाम अपने आप में रोचक और अद्भुत रही। सबके चहेते प्रख्यात शायर, फिल्मकार, गीतकार और रचनाकार फहमी बदायूंनी (बदायूं), शकील आजमी (मुंबई), डॉ. सुनील पंवार (बेंगुलुरु), अजहर इकबाल (मेरठ), आशू मिश्रा (बरेली) और शायर मदनमोहन दानिश ने जब अपनी शायरी की तहें खोलीं तो नाद एम्फीथिटर की शाम दमक उठी। सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह कुलाधिपति रूचि सिंह ने दिए। संचालन जयंत तोमर ने किया।

आइटीएम यूनिवर्सिटी के फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह ने ‘इश्क के रंग’ विषय का विवेचन करते हुए कहा कि प्रेम क्या है, प्रेम साधारण से असाधारण होने की प्रक्रिया है। प्रेम में भावना है या रिश्ता है या कि कामना है या कि ईष्र्या है या कि लालसा है, आकांक्षा है, तृप्ति है ये प्रेम है क्या? एक बहुत बड़े फिलोसिफर जयकृष्ण ने कहा है कि ये है कि वो है न वो है न ये है, खुद करो तो पता चलेगा कि प्रेम क्या है। ये वो है जो न कहा जा सकता है न लिखा जा सकता है।

अस्ल में पाया ही हमने तब उसे
जब उसे खोने का डर जाता रहा
जाने किसका ख़ौफ़ था दानिश मुझे
अपने पास आने से घबराता रहा
उसका चेहरा बनाने से पहले
फूल से मशवरा किया मैंने
जिसका कुछ नाम ही न था दानिश
उस तअल्लुक़ को भी जिया मैंने...।
मदनमोहन दानिश, ग्वालियर

आप जिस चीज़ को कहते हैं कि बेहोशी है
वो दिमाग़ों में जऱा देर की ख़ामोशी है
सूखते पेड़ से पंछी का जुदा हो जाना
ख़ुद-परस्ती नहीं अहसान-फरामोशी है
आशू मिश्रा, बरेली

अपनी मर्यादाओं का गुणगान करते रह गए
देश हित में देश का नुकसान करते रह गए
कोई उसको प्रेम की चादर उढ़ा कर ले गया
और हम संबंध का सम्मान करते रह गए...।
अजहर इकबाल (मेरठ)

कमरा खोला तो आंख भर आई
ये जो ख़ुशबू है जिस्म थी पहले,
टहलते फिर रहे हैं सारे घर में
तेरी ख़ाली जगह को भर रहे हैं,
रात भी जब तुम्हारा फ़ोन आया
तुम हमारे ही पास बैठे थे,
दोस्तों ने हंसा दिया आ कर
अच्छे ख़ासे उदास बैठे थे...।
फहमी बदायूंनी, बदायूं

फिर एक शेर उसी दिलरुबा के बारे में,
मैं उसके छूने से अच्छा हुआ बताता किसे
सभी ने पूछा था मुझसे दवा के बारे में,
इसी ख़ता पे बुझाए गए चराग़ मेरे,
मैं जानता था बहोत कुछ हवा के बारे में....
उन्होंने अपनी एक और रचना पढ़ते हुये कहा-
हक़ीक़तों के सफर में गुमान ज्यादा है
ये जि़न्दगी है यहां इम्तिहान ज्यादा है
ज़मीन इस लिए नाराज़ रहती है हमसे
हमारे सर पे ही क्यों आसमान ज्यादा है
अगर बुझे तो धुआं बन के फैल जाएंगे
हवा में जल के हमें इत्मेनान ज्यादा है...।
शकील आजमी

रात भर बुनियाद घर की सिसकियां लेती रही कोई तो रोया है इस दीवार से लग कर बहुत...
डॉ. सुनील पंवार, बेंगलुरु