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परमात्मा की अदालत में दंड का विधान, वे प्रायश्चित का भी देते हैं अवसर : साध्वी दीपिका भारती

- फूलबाग मैदान में श्रीरामकथामृत का तीसरा दिवस

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परमात्मा की अदालत में दंड का विधान, वे प्रायश्चित का भी देते हैं अवसर : साध्वी दीपिका भारती

परमात्मा की अदालत में दंड का विधान, वे प्रायश्चित का भी देते हैं अवसर : साध्वी दीपिका भारती

ग्वालियर. परमात्मा की अदालत में दंड का विधान हैं, लेकिन वे प्रायश्चित का भी अवसर देते हैं। गलती का अहसास होने पर हम सच्चे मन से परमात्मा से क्षमा मांगकर अपने जीवन में गलतियों को नहीं दोहराते हैं तो दयालु परमात्मा हमें माफ कर देता है। यह विचार साध्वी दीपिका भारती ने दिव्य जाग्रति संस्थान द्वारा फूलबाग मेें हो रही श्रीरामकथामृत के तीसरे दिन श्रोताओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। साध्वी दीपिका ने रामरस की वर्षा करते हुए कहा कि मन यमदूत की तरह है। मन की वृत्ति मनुष्य को नीचे की ओर ले जाने की है, जिसकी वजह से मनुष्य काम-वासना, झूठ इत्यादि बुराईयों में लिप्त हो जाता है, लेकिन मन जब ज्योर्तिमय स्वरूप आत्मा से संबद्ध होता है तो वह परमात्मा का रूप हो जाता है। जाने-अनजाने में हमसे बहुत से पाप हो जाते हैं, परमात्मा की अदालत में जिनका फैसला होता है, इसलिए मनुष्य सभी धारणाओं का त्याग करके प्रभु की शरण में आ जाता है तो उसका कल्याण हो जाता है। अहिल्या उद्धार की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि श्रीराम की प्रेरणा से हवा का एक झोंका आता है और उनकी चरण रज से पाषाण अहिल्या चैतन्य हो जाती है। इस तरह अहिल्या ने अपने स्वरूप को पुन: पा लिया और वो राम का ही रूप हो गई।

आत्मिक स्तर पर जागृत होना पड़ेगा
रामलीला का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि उनका रूप वात्सल्य रति प्रदान हैं। उन्होंने गुरूकुल में संपूर्ण शिक्षा ग्रहण की। ताडक़ावन में ताडक़ा व मारीच सुबाहु का वध किया। श्रीराम विवेकी पुरूष थे, उन्हें पता था कि उन्हें अपनी शक्तियों का सदुपयोग कहां करना है और कहां दुरूपयोग से बचाना हैं। उन्होंने कहा कि जब तक सत्ता में बैठा प्रत्येक अधिकारी आत्मिक स्तर पर जागृत नहीं होगा, वह समाज का कल्याण नहीं कर सकता।

अभिमान का नाश करने का काम करता है शिव का धनुष
धनुष यज्ञ के रहस्य को उद्घाटित करते हुए साध्वी दीपिका ने कहा कि भगवान शिव का धनुष प्रत्येक युग में अभिमान का नाश करने का विहंगम कार्य करता है। उन्होंने सीता स्वयंवर में उपस्थित राजाओं को भ्रष्टाचारी बताते हुए कहा कि सत्ताधारी के भीतर जब जब स्वाभिमान की जगह अभिमान ले लेता है तो वह भ्रष्ट हो जाता है। स्वाभिमान का अर्थ है प्रत्येक जन में प्रभु की ही आत्मा को देखना।