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आप भी महारानी लक्ष्मीबाई को मानते हैं देश का गौरव तो यह खबर हो सकती है प्रेरणादायक

gwalior salute for Rani Laxmibai : वीरांगना लक्ष्मीबाई में देशभक्ती का जज्बा भरा हुआ था

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maharani laxmi bai in gwalior

आप भी महारानी लक्ष्मीबाई को मानते हैं देश का गौरव तो यह खबर हो सकती है प्रेरणादायक

ग्वालियर। अपनी अद्भुत वीरता,युद्ध कौशल,साहस और कभी न खत्म होने वाले देश प्रेम के कारण एक साधारण सी बालिका मनु एक कालजयी वीरांगना लक्ष्मीबाई बन गई। देशभक्ती का जज्बा जिसके रंग-रंग में भरा हुआ था और आज भी वह करोड़ों लोगों की प्रेरणा हैं। ऐसी वीरांगना से आज भी राष्ट्र गर्वित एवं पुलकित है। उनकी देश भक्ति की ज्वाला को काल भी बुझा नहीं सकता। रानी लक्ष्मीबाई को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। क्योकि उन्होंने देश के लिए जो बलिदान और कुर्बानी दी है उसका अब तक कोई जवाब नहीं है।

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अभी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए जारी अपने घोषणपत्र में भाजपा ने विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिलाने का वादा किया है। ऐसे में सावरकर एक बार फिर राजनीति के केंद्र में हैं। साथ भाजपा ने सावरकर के अलावा सावित्री बाई फुले को भी भारत रत्न दिलाने का वादा किया है। लेकिन शहर के लोगों को कहना है कि देश में सावरकर के साथ ही और भी कई देशभक्ती का जज्बा रखने वाले हंै। जिसमें सबसे पहला स्थान वीरांगना लक्ष्मीबाई का। ऐसे में कहीं न कहीं उन्हें भी वह सम्मान मिलना चाहिए जिसकी वो हकदार है।

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दो दिन तक अंग्रेजों से लिया लोहा
महारानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर की धरती पर फिरंगियों से दो दिन तक लोहा लिया। झांसी से यहां आने के बाद ग्वालियर दुर्ग पर रानी अपने अंग रक्षकों के साथ घिर गईं। अंग्रेजों की व्यूह रचना तोड़ते हुए वे किला के पिछले गेट से निकल आईं। युद्ध करते हुए रानी स्वर्ण रेखा नदी तक पहुंच गईं। घायल रानी को अंगरक्षक गंगादास की शाला तक लेकर पहुंचें।


समाधि स्थल
26 मई 1978 को अधिसूचना जारी कर समाधि स्थल को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। 1925 में स्मारक स्थल पर प्रतिमा लगाई गई। लक्ष्मीबाई के समाघि स्थल पर जाकर हर वर्ष श्रद्धांजलि दी जाती है।


वीरांगना मेला
फूलबाग स्थित समाधि स्थल पर 17 सालों से वीरांगना बलिदान मेला आयोजित किया जा रहा है। इसकी शुरुआत साल 2000 में हुई थी। रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर नाटक का मंचन होता है।

शहर ने रखा बलिदान को याद
विक्टोरिया कॉलेज का नाम बदलकर महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाणिज्य
महाविद्यालय किया महारानी लक्ष्मीबाई कन्या विद्यालय, मुरार
लक्ष्मीबाई कॉलोनी रानी लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजीकल एजुकेशन
रानी लक्ष्मीबाई पार्क


गुरुजी गंगादास जी से मांगे दो वचन
युद्ध में घायल रानी ने महंत गंगादास जी महाराज (वे उनके गुरूजी भी थे. रानी लक्ष्मीबाई को उनके पिता गुरू-शिष्य परंपरा के चलते 5 साल की उम्र में लेकर आए थे) से कहा कि मेरे बचने की उम्मीद नहीं है। आप मेरे पुत्र दामोदर राव की रक्षा और कोई भी मलिच्छ (अंग्रेजों का कहते थे) शरीर को न छू सके। इसकी सुरक्षा का वचन दीजिए। बालक को दो साधुओं के साथ कंठी माला पहनाकर और चंदन लगाकर निकाल दिया। रानी लक्ष्मीबाई को गंगाजल,तुलसी दिया। यहीं वीरांगना ने शरीर छोड़ दिया

745 साधुओं ने दी कुर्बानी
महंत रामसेवक दास ने बताया कि शाला में 2000 नागा साधु रहते थे। जहां लक्ष्मीबाई का समाधी स्थल है, वहां शाला महंत की कुटिया थी। अंग्रेजों से घिरने पर, महंत ने लक्ष्मीबाई के पार्थिव शरीर को ले जाने चक्रव्यूह बनाया। नागा साधु और अंग्रेजों में युद्ध हुआ, जिसमें 745 साधुओं ने कुर्बानी दी। महंतजी ने कुटिया में ही टीलेेनुमा ढेर में रखकर लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार कर दिया।

यह थे 20 हथियार
गुर्ज, चेस्ट प्लेट, पंजा, छड़ी/गुप्ती/रिवाल्वर, दस्ताना, ढाल, तेगे, हेल्मेट आदि शामिल हैं। महारानी लक्ष्मीबाई से टकराने में दुश्मन को सो बार सोचना पड़ता था। बिजली सी चमक के साथ वह अपने दुश्मनों पर टूट पड़ती थीं। वह हमेशा 20 तरह के हथियार और 10 तरह के कवच हमेशा पहनकर रहती थीं। रानी की खासियत थी कि वह दोनों हाथों से तलवार चलाती थीं। जानकारों के अनुसार शस्त्र व कवच का वजन लगभग 30 किलो तक होता था।