morena district village holi celebration news : इस दौरान जहां बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है वहीं मान्यों को उपहार भी दिए जाते हैं। लोकगीतों के साथ प्रभात फेरी निकाल कर बाबा विजयानंद के स्थान पर नमन करती हैं।
मुरैना/कैलारस...
रंगों के त्योहार होली पर देश के विभिन्न हिस्सों में अलग परंपराओं का निर्वाह होता है। रंग, अबीर, गुलाल और होलिका दहन तो लगभग सभी जगह होता है। ग्वालियर-चंबल संभाग में वैसे तो दंगल, नाल उठाना और फाग की परंपरा तो कई हंै, लेकिन कई जिलों में होली मनाने के विविध एवं अनूठी परंपराओं को पालन किया जाता है। इन परंपराओं का स्थानीय स्तर पर बहुत महत्व है। पत्रिका ने इस बार अपने पाठकों के सामने उनकी रुचि को ध्यान में रखकर अंचल की भिन्न परंपराओं को उजागर करने की कोशिश की है। आओ इस होली पर हम एक-दूसरे के चेहरों पर ही नहीं बल्कि दिलों में भी स्नेह, सौहार्द और प्रेम के रंग लगाएं। भाई-चारे और विकास की पिचकारी से एक-दूसरे का तन और मन रंग दें।
आओ खेलें प्रेम की होली : पड़वा पर 16 शृंगार कर निकलती हैं महिलाएं
गंगा में विसर्जित की होली की आग तो रुकी आगजनी
कैलारस के शेखपुर गांव में आगजनी की घटनाएं बहुत होती थीं। ग्रामीणों ने अपनी इस समस्या के निदान का उपाय गांव के सिद्ध संत विजयानंद महाराज से पूछा। संत ने होली की अग्नि को एक बार गांव से सोरों ले जाकर गंगा में विसर्जित करवाया। इस समस्या से निजात के लिए गंगा मैया से प्रार्थना की। इसके साथ ही गांव में आगजनी की घटनाएं थम गईं। संत ने गांव को प्राकृतिक आपदा से भी मुक्त करने का वरदान दिया। अभी भी शेखपुर गांव में ओलावृष्टि नहीं होती है। संत विजयानंद आश्रम के महंत रामलाखन दास के अनुसार गांव में आपसी सौहार्द और प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिए संत ने ग्रामीणों के बीच इस परंपरा को शुरू कराया, जिसे आज भी लोग पूरी सिद्धत से निभा रहे हैं।
कैलारस के शेखपुर गांव में 500 साल पुरानी ऐसी पंरपरा का निर्वाह किया जा रहा है, जो जिले में ही नहीं संभवत: प्रदेश और देश में इकलौती होगी। यहां होली पर गांव की बहू-बेटियां 16 शृंगार कर प्रभात फेरी निकालती हैं। इस दौरान जहां बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है वहीं मान्यों को उपहार भी दिए जाते हैं। लोकगीतों के साथ प्रभात फेरी निकाल कर बाबा विजयानंद के स्थान पर नमन करती हैं। पुरुष फाग और नाल उठाने की परंपरा का निर्वाह करते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे दिलचस्प कहानी है। गांव में आपसी भाईचारा, समृद्धि और खुशहाली के लिए इस परंपरा का निर्वाह 500 साल से किया जा रहा है। इस दौरान परंपरागत वाद्ययंत्रों के साथ गांव के लोग फाग, धार्मिक और लोकगीतों का गायन करते हैं। गांव की बेटी आरती त्यागी के अनुसार इस परंपरा का एक फायदा यह भी है कि सभी लोग इस त्योहार पर मिल जाते हैं।
130 किलो का नाल उठाते हैं लोग
प्रभात फेरी के बाद फाग गायन होता है। दोपहर बाद गांव के बाहर खेतों में नाल उठाओ प्रतियोगिता होती है। मुरैना के अलावा आसपास के जिलों से भी नाल उठाने के शौकीन पहलवान शामिल होते हैं। यहां 130 किलो वजन तक के नाल उठाए जाते हैं। एक हाथ से नाल उठाने के बाद उसे पीठ पर गर्दन के सहारे रखकर पूरे मैदान का चक्कर भी पहलवान लगाते हैं। ग्रामीणोंं के अनुसार बाबा विजयानंद ने आपसी सौहार्द व भाईचारे के लिए यह परंपरा शुरू कराई थी। आज भी गांव में वैमनस्यता नहीं है। प्राकृतिक आपदा का प्रकोप भी नहीं होता है।