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राजा मानसिंह तोमर जयंती : 700 साल पहले 300 फीट ऊंचे पहाड़ पर कला-संस्कृति के अद्भुत रूप रचे राजा मानसिंह ने

ग्वालियर में राजा मान सिंह तोमर जयंती समारोह: कहा जाता है कि राजा मानसिंह तोमर शिकार के लिए राई गांव की ओर जाते थे।

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राजा मानसिंह तोमर जयंती : 700 साल पहले 300 फीट ऊंचे पहाड़ पर कला-संस्कृति के अद्भुत रूप रचे राजा मानसिंह ने

ग्वालियर । लगभग 700 वर्ष पूर्व जब न तो के्रन थी और न पत्थर काटने के यंत्र, उस समय सिर्फ प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं वाले ही हुआ करते थे, तब राजा मानसिंह ने लगभग 300 फीट ऊंचे पहाड़ पर वास्तुकला का अद्भुत प्रयोग कर ऐतिहासिक शिल्प कला को मूर्त रूप दिया। । था। ।

यहां बनाए गए मानसिंह महल, गूजरी महल, विशाल जैन प्रतिमाओं आदि को देखने आज भी देश-विदेश के पर्यटक आते हैं और उस समय के दौर की शिल्प कला की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाते हैं। राजा मानसिंह धु्रपद के बटारक, प्रचारक और उन्नायक होने के साथ ग्वालियर संगीत घराने के संस्थापक भी। राजा कल्याण सिंह के पुत्र राजा मानसिंह 1486 में ग्वालियर के शासक बने।

अनोखा प्रेमाख्यान बनाया

कहा जाता है कि राजा मानसिंह तोमर शिकार के लिए राई गांव की ओर जाते थे। एक बार मार्ग में दो भैंस लड़ रहे थे और मार्ग अवरूद्ध हो गया था। राजा खड़े हो गए तभी मृगनयनी ने दोनों भैंसों के सींगों को पकड़ कर उन्हें अलग कर दिया। राजा उस बाला की हमुरी और उसके नैसर्गिक सौंदर्य पर मोहित हो गए। उन्होंने शादी का प्रस्ताव रखा। उसके लिए उन्होंने महल में सांक नदी से पानी लाने की व्यवस्था की, क्योंकि उसकी शर्त थी कि वह इसी नदी का पानी पीयेगी। उन्होंने अपनी रानी रानी के निवास के लिए गूजरी महल बने, जो एक अनूठा प्रेम स्मारक है। पहले इसका नाम बादल महल था, बाद में गूजरी महल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

राजा मानसिंह ने पनिहार ग्राम के निकट ग्राम बरई में एक रास मंडप और रंगमंच बनवाया था। यहां शरद पूर्णिमा की पूर्ण चंद्र धवल चांदनी में कलाकारों द्वारा कृष्ण और गोपियों का रूप धारण कर रास नृत्य-महाराज मानसिंह, उनके कलाकारों, सेनापतियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता था।

मानसिंह ने जैन धर्म को बढ़ाने के लिए किले पर पहाड़ को तराश कर विशाल मूर्तियां बनवाईं। यहाँ विशाल पद्मासन, खडग़ासन, प्रसिद्ध गोपाचल पर्वत के चारों ओर जैन मूर्तियां हैं, जो विश्व में नहीं हैं। मानसिंह ने सोनेगिर में जैन धर्म के मंदिरों के निर्माण व उत्थान के साथ शिक्षा को भी बहकाया।

हमारा दुर्ग आलीशान है दुनिया के दुर्गों से।

ये सुंदर और सलौना लगता है कि जन्नत व स्वर्गों से है।

सहे हैं हादसे तो न कोई फिर भी सानी है।

जमीनें ग्वालियर बाफैज संतों बुजुर्गों से हैं।

- कवि, डॉ। कैलाश कमल जैन