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सूरज कुंड का पानी पीने से दूर हो गया था राजा सूरज सेन का कुष्ठ रोग

ऋषि के नाम पर गालव से ग्वालिपा होते ही शहर का नाम पड़ा ग्वालियर

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सूरज कुंड का पानी पीने से दूर हो गया था राजा सूरज सेन का कुष्ठ रोग

सूरज कुंड का पानी पीने से दूर हो गया था राजा सूरज सेन का कुष्ठ रोग

ग्वालियर.

ग्वालियर किले पर बना सूरज कुंड अपने अंदर बहुत सा इतिहास समेटे हुए है। यहीं से जुड़ी घटना से शहर को ग्वालियर के नाम से पहचान मिली। इस कुंड के बीचोंबीच एक शिव मंदिर है, जहां लोग आज भी पूजा के लिए जाते हैं। इस कुंड की बाउंड्री छठवीं शताब्दी में राजा सूरज सेन के द्वारा बनवाई गई। लगभग 22 मीटर गहरे कुंड में जाने के दो रास्ते और शिव मंदिर तक पहुंचने का एक रास्ता है। यह कुंड पुरातत्व विभाग के अधीन आता है, लेकिन इस समय यहां देखरेख का आभाव है, जिस कारण यह अपना अस्तित्व खोता जा रहा है।

ऋषि गालव की आज्ञा लेकर पिया था पानी
बताया जाता है कि छठवीं शताब्दी में किले पर केवल जंगल था। राजा सूरज सेन इस क्षेत्र में शिकार करते हुए रास्ता भूलकर आ गए। उन्हें बहुत प्यास लगी थी। तब उन्हें सरोवर दिखा। सूरज सेन कुष्ठ रोग से पीडि़त थे। गालव ऋषि की आज्ञा उन्होंने पानी पीया। कुछ समय बाद ही उनका रोग ठीक हो गया। इसे उन्होंने चमत्कार माना और वापस आकर कुंड के चारो ओर बाउंड्री तैयार कराई। इसके बाद कुंड का नाम अपने नाम पर सूरज कुंड रखा और ऋषि के नाम पर गालव से ग्वालिपा होते हुए शहर का नाम ग्वालियर पड़ा।

लाइट एंड साउंड शो में मिलता है सूरज कुंड का जिक्र
इतिहासकारों के अनुसार आज भी मप्र के लाइट एंड साउंड शो में सूरज कुंड का जिक्र होता है। वर्तमान में सूरज कुुंड में बारिश का पानी है, जिसमें गाद भरी हुई है। बीच-बीच में यह कुंड सूख जाता है और फिर सिंधिया स्कूल और बारिश के पानी से भर जाता है। इस कुंड के पीछे अंग्रेजों के समय के बने इंग्लिश बैरक हैं, जहां सिंधिया स्कूल के शिक्षक रहते हैं। यह कुंड बहुत ही प्राचीनतम बावड़ी के रूप में पहचान रखता है।

गंदा पानी देखकर लौट जाते हैं रोगी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आज भी उस दौर की मान्यता को सुनकर रोगी आते हैं, लेकिन गंदा पानी देखकर लौट जाते हैं।

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