प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ग्वालियर का अमिट योगदान है। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ महारानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष गाथा के स्वर्णिम अध्याय यहीं रचे गए। ग्वालियर शहर का शायद ही कोई एेसा इलाका हो, जहां महारानी ने अंग्रेज अफसरों को धूल न चटाई हो।
अंत में वे यहीं शहीद भी हो गईं। आज बेशक उनकी रणभूमि बदल गई हो लेकिन जब भी कोई इतिहास के पन्ने पलटता है तो वीरांगना के बलिदान की कहानी अंतरमन में बस जस जाती है।
(महारानी लक्ष्मी बाई के अस्त्र-शस्त्र)
ग्वालियर किला/लक्ष्मण पहाडि़या
अठारह जून को जब उन्हें जैसे ही पता चला कि उनकी सेना मुरार में फंस गई है तो वे तत्काल उनकी मदद के लिए पठान सैनिकों का एक घुड़सवार दस्ता लेकर उरवाई गेट से निकलीं।
सबसे पहले वे लक्ष्मण पहाडि़या पहुंचीं। अंग्रेजों से पहला संघर्ष यहीं हुआ। यहां वे विजयी रहीं।
रामबाग
यहां भी ब्रिटिश कंपनी की एक टुकड़ी को पराजित किया। लाल घाटी और मुरम पर जबरदस्त संघर्ष हुआ था।
शिंदे की छावनी, लंगड़े की चौकी---पहाडि़या से उतरकर शिंदे की छावनी पर लंगड़े की चौकी नामक स्थान पर अंग्रेजों को परास्त कर फिर आगे बढ़ीं।यहां उनकी मदद के लिए साधुओं की एक टुकड़ी भी आ गई थी।
(महारानी लक्ष्मी बाई के अस्त्र-शस्त्र)
नौगजा रोड
उनका अंग्रेजी कंपनी की सेना से अगला संघर्ष नौगजा रोड पर हुआ। यहां 370 साधु और कुछ पठान सैनिक मारे गए। यहां से महारानी को साधु किसी तरह बचाकर आगे ले गए। इस बीच उनकी मदद के लिए
(महारानी लक्ष्मी बाई के अस्त्र-शस्त्र)
फूलबाग नाला
यहीं वीरांगना का घोड़ा फंसा। यहीं पर बड़ी शाला के साधुओं की मदद से उन्होंने महान संघर्ष किया और हमेशा के लिए स्वर्ग सिधार गईं।
(महारानी लक्ष्मी बाई के अस्त्र-शस्त्र)
शहर में तात्या टोपे के साथ ऐसे दाखिल हुई थीं महारानी
महारानी लक्ष्मी बाई के साथ तात्या टोपे और 200 घुड़सवार शहर में दाखिल हुए थे। महारानी के सम्मान में गदर के सिपाहियों ने हवाई फायर किए। ड्योढ़ी पिटवाकर समूचे बाजार को खुलवाया गया। बाद में ब्रह्मभोज करवाया गया।
स्त्रोत- अमृतलाल नागर द्वारा रचित आंखों देखा गदर नामक अनुवाद पुस्तक। मूल लेखक विष्णु भट्ट गौडसे द्वारा रचित माझा प्रवास एवं अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ नागर गाथा।