. दिल्ली दरबार में शाहजहां बादशाह हैं। जिनके दो बेटे शेरवान-ए-आरा और जलाल आलम-ए-शमशीर व एक बेटी जहां आरा हैं। जहां अपने कमरे में आराम फरमा रही है। इतने में सांप उनके आरामगाह में घुस आता है। उनकी दासी हमीदा बानो उसे मार नहीं पाती और अपने मंगेतर आजम खान को बुला लाती है। आजम उसे बंदूक से मारता है और जहां की नींद खुल जाती है। वह अपने भाइयों को बुलाती है और उनके आराम में खलल डालने के लिए आजम को सजा देने को कहती है। यह दृश्य नाटक दिल्ली दरबार में रविवार को देखने का मिला। अवसर था भगवत सहाय सभागार में संगीत नाटक अकादमी और परिवर्तन समूह की ओर से चल रहे पारंपरिक नाट्ययोत्सव के समापन अवसर पर पारसी नाट्य शैली के मंचित नाटक दिल्ली दरबार का। मंचन से पहले संगीत नाटक अकादमी के उपसचिव सुमन कुमार और नाटक के पारसी शैली के मशहूर निर्देशक जफर संजरी को परिवर्तन समूह की ओर से शॉल श्रीफल और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
भारत के इतिहास में राज दरबारों में कभी अन्याय के किस्से सुनाई नहीं देते रहे हैं। हमेशा सच को न्याय मिला है। भले ही इसमें थोड़ी देर जरूर हुई हो। रविवार को रंगमंच के रूप में सजे दिल्ली दरबार में हजारों वर्ष पुरानी परंपरा जारी रही और बेगुनाह को न्याय मिला।
दिल्ली दरबार में अगले दृश्य में शेरवान उसकी आंखें निकाल लेने को कहता है और उसे थप्पड़ जड़ देता है। लेकिन आलम शहजादी की जान बचाने के लिए उसको छोड़ देने और उल्टा उसे मारने वाले अपने भाई का हाथ काटने की बात कहता है। मामला शाहजहां के पास दरबार में पहुंचता है। जहां बेटों के बीच के तनाव को देखकर बादशाह आजम को जेल में डाल देते हैं। इस मौके का फायदा उठाकर मंत्री सादुल्ला खां शेरवान को भड़काता है और तख्त का बादशाह बनने के लिए अपनी बहन का कत्ल करने और भाई को जंग पर भेजने की सलाह देता है। लेकिन आलम जंग जीतकर लौट आते हैं और जहां अपनी जान षड्यंत्र से बचा लेती है। आलम राजा बनते हैं और भाई और मंत्री को मौत की सजा सुनाते हैं और आजम की शादी हमीदा से हो जाती है। इस तरह दिल्ली के दरबार में बेगुनाह को न्याय मिल जाता है।