20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जानिए इनके कैसा था आजादी के पहले का भारत, खुशी और गम दोनों का मेल

इस स्वतंत्रता दिवस पर हम एेसे ही खास व्यक्तियों से परिचित करवा रहे हैं जिन्होंने किसी न किसी तरह से अपना योगदान दिया।

3 min read
Google source verification
india before independence

ग्वालियर। देश की आजादी में स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारियों का जितना योगदान है ठीक उसी तरह आजादी को बरकरार रखने में सैनिकों ने अपनी भूमिका निभाई है। इस स्वतंत्रता दिवस पर हम एेसे ही खास व्यक्तियों से परिचित करवा रहे हैं जिन्होंने किसी न किसी तरह से अपना योगदान दिया।

कई महत्वपूर्ण मिशन को दिया अंजाम
मैंने सेना में रहते हुए कई महत्वपूर्ण मिशन को अंजाम दिया। यहां तक कि उनकी पूरी यूनिट पर पाकिस्तान की फौज ने हमला कर दिया लेकिन वो बच निकले। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर पार्टिशन, चीन युद्ध और कारगिल युद्ध लड़ा। उन्होंने पत्रिका से बातचीत में कई बातें शेयर कीं। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वो १९३९ में वर्मा ऑपरेशन में थे। यहां उनकी मुलाकात सुभाषचंद्र बोस से हुई। जबकि वर्धा में वो महात्मा गांधी से मिले तो वहां गांधीजी ने उनसे कहा कि जीवन में हमेशा सादा जीवन उच्च विचार रखना। इसका उन्होंने हमेशा पालन भी किया। उन्होंने जम्मू पठानकोट सड़क का निर्माण कराया। वे हमेशा ही दुश्मनों की हिट लिस्ट में रहे।


लाइब्रेरी में नहीं जा सकते थे इंडियन

तेरह साल की उम्र में मैं अपने पापा के साथ मसूरी गया। वहां हम अंकल कवि सत्यचेतु विद्यालंकार के यहां रुके। वहीं पास एक लाइब्रेरी थी, जहां मैंने जाने की इच्छा जाहिर की। तब अंकल ने बताया कि वहां इंडियंस नहीं जा सकते, लेकिन मैंने जिद पकड़ ली, तब उन्होंने वहां लगा बोर्ड दिखाया, जिस पर लिखा था इंडियन एंड डॉग सा नॉट एलाउड। यह देख मुझे बहुत बुरा लगा। घर आकर मैंने सभी से यही क्वेश्चन किया कि ये अंग्रेज कौन हैं और हम इंडियंस पर इतनी पाबंदी क्यों। स्वतंत्रता के बाद मेरा अंकल से पहला सवाल यही था कि अंकल क्या वह बोर्ड अब हट गया। मैं लाइब्रेरी घूमने आ सकता हूं। उन्होंने कहा कि बिल्कुल अब इंडियंस लाइब्रेरी जा सकते हैं। यह सुन मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।

दिवाकर विद्यालंकार, शिक्षाविद्


कई जगह होता था झंडावंदन
10 अगस्त 1947 को मैं पाकिस्तान से इंडिया आया। सोचा कि एक हफ्ते रुककर पाकिस्तान चला जाऊंगा, लेकिन स्थितियां बिगड़ती गईं और मुझे मुरैना में शेटल्ड होना पड़ा। मुझे याद है 15 अगस्त 1947 को मुरैना के रेलवे स्टेशन पर तिरंगा फहराया गया, जिसके बाद से उसका नाम तिरंगा चौक पड़ गया। मुरैना एवं आसपास के लोग वहां इकट्ठा हुए। उत्साह इतना था कि देखते ही बनता था। क्या छोटा, क्या बड़ा और क्या बूढ़ा सभी दिल से उत्साहित थे और मिठाइयां बांटी गईं। उन दिनों की सुविधाओं के अनुसार पूरा शहर दुल्हन की तरह सजा था। कुछ समय भांडेर रहने के बाद ग्वालियर में जीवाजी इंडस्ट्री रिसर्च लेबोरेट्री में नौकरी की और यहीं रहने लगा। उन दिनों शहर में कई जगह झंडावंदन होता था।

एसएल गांधी, बिजनेसमैन


आजादी के मूवमेंट में लिया था भाग

मैं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं रहा, लेकिन मैंने आजादी के मूवमेंट में भाग जरूर लिया। उन दिनों हमारा आदर्श विद्यालय के नाम से स्कूल हुआ करता था। वहां राम सहाय, गौतम जी, गुले साब आकर रुका करते थे और आजादी पाने के तरीके में बातें होती थीं। मैं भी वहीं बैठकर सब सुना करता था। योजनाएं बनती थी और उन्हें पूरा करने का टारगेट रखा जाता था। स्कूल में ही खाना-पीना और रुकना होता था। जिस दिन स्वतंत्रता मिली। उस दिन सबसे पहले एसएएफ ग्राउंड में तिरंगा फहरा। पूरा शहर इकट्ठा हुआ। उस दिन जो जश्न का माहौल था, वह पूरे साल बना रहा। हर दिन घरों में उत्सव सा माहौल रहता था। उन दिनों ग्वालियर स्टेट था और यहां का कुछ अलग ही नजारा हुआ करता था।

कौन से नेता यहां आते हैं और कहां रुकते हैं। इसकी खबर दिल्ली तक रहा करती थी। इसीलिए सभी मेरे पिता को भी जानने लगे थे।

श्रीकृष्ण दास गर्ग, पूर्व अध्यक्ष, चैंबर ऑफ कॉमर्स