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बेटियों ने दी पिता को मुखाग्नि, अंतिम संस्कार की परंपरा निभाकर दिया समाज को संदेश

रूढ़िवादी परंपरा तोड़कर बेटियों ने निभाया बेटे का कर्तव्य, मुक्तिधाम पर भावुक हुआ माहौल

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बेटियों ने दी पिता को मुखाग्नि, अंतिम संस्कार की परंपरा निभाकर दिया समाज को संदेश

बेटियों ने दी पिता को मुखाग्नि, अंतिम संस्कार की परंपरा निभाकर दिया समाज को संदेश

ग्वालियर। ग्वालियर में दो बेटियों ने रूढ़िवादी सोच को पीछे छोड़ते हुए अपने पिता के अंतिम संस्कार की सभी परंपराएं स्वयं निभाईं। उन्होंने न केवल पिता के पार्थिव शरीर को कंधा दिया, बल्कि श्मशान घाट पर चिता को मुखाग्नि भी दी। यह दृश्य मुक्तिधाम पर मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर गया और समाज को बराबरी का सशक्त संदेश दे गया।

सेवानिवृत्त प्रशासकीय अधिकारी डी.एस. करवड़े का 94 वर्ष की आयु में शनिवार शाम हार्ट अटैक से निधन हो गया। उनके पीछे दो बेटियां दीपा चालीसगांवकर और डॉ. शिल्पा बुचके हैं। दीपा मुंबई में रहती हैं, जबकि डॉ. शिल्पा ग्वालियर के कर्मचारी बीमा अस्पताल में वरिष्ठ चिकित्सक हैं।

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार की रस्में प्रायः पुत्र द्वारा निभाई जाती हैं, लेकिन इन बेटियों ने यह धारणा तोड़ते हुए स्वयं पिता को अंतिम विदाई दी। दोनों ने भावुक मन से पिता के शव को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।

इस दौरान वहां उपस्थित लोग भावुक हो उठे। बेटियों के इस साहसिक और संवेदनशील कदम ने न केवल अपने पिता को श्रद्धांजलि दी, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि बेटा और बेटी में कोई भेद नहीं होता। सच्चा कर्तव्य और संस्कार प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी से निभाए जाते हैं, न कि केवल परंपराओं से।