
Gwalior Tourism : ग्वालियर टूरिस्ट सर्किट में शामिल होंगी देवगढ़, पिछोर और सालबाई की गढ़ी
धर्मेन्द्र त्रिवेदी @ ग्वालियर
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्यटन के लिए विख्यात ग्वालियर टूरिज्म सर्किट में जिले के देवगढ़, पिछोर और सालबाई की गढ़ी को भी शामिल किया जाएगा। यहां आने वाले पर्यटक बुंदेलखंड जाने से पहले अंगे्रज और मराठाओं के बीच १७८२ में हुई संधि के स्थान सालबाई को देख सकेंगे। आंचलिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बने इस प्लान के लिए प्रदेश शासन से अनुमति मिलने के बाद काम शुरू किया जा रहा है। पर्यटन स्थल विकसित करने के साथ इन स्थानों पर मौजूद जल स्रोतों को जल संग्रहण के लिए भी उदाहरण बनाया जाएगा।
इस तरह बनेगा सर्किट
आगरा-झांसी-खजुराहो टूरिस्ट सर्किट में ग्वालियर का महत्वपूर्ण स्थान है। इस टूरिस्ट सर्किट में पर्यटन का प्लान बनाने वाले पर्यटकों को ग्वालियर आने पर आंचलिक पर्यटन के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा। पर्यटकों को ग्वालियर से झांसी जाने से पहले तानसेन की जन्म स्थली बेहट, देवगढ़ किला, पिछोर किला, सालबाई गढ़ी, पवाया (धूमेश्वर) होकर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
भिंड, मुरैना,दतिया,श्योपुर,शिवपुरी में की कई टूरिस्ट प्लेस हैं जिन्हें देखने के लिए टूरिस्ट आते हैं। ग्वालियर के बेहट में तानसेन की समाधि बनी हुई है। तानसेन को संगीत सम्राट भी कहा जाता है। तानसेन के नाम पर ग्वालियर में तानसेन समारोह होता है जिनमें देश-विदेश से विदेशी कलाकार आते हैं।
इन किलों का किया जा रहा विकास
इन स्थानों का
इन स्थानों का ऐतिहासिक महत्व है। स्थानीय लोगों को भी इतिहास के संबंध में इससे जानकारी मिलेगी और पर्यटकों को भी आकर्षित किया जा सकेगा।
अनुराग चौधरी, कलेक्टर
टूरिज्म जॉब भी बढ़ेंगे
अंचल की गढ़ी को विकसित करा रहे हैं, इसके लिए हमारी पर्यटन विभाग भोपाल से बात हो गई है। साथ ही जल संरक्षण के काम भी करा रहे हैं। इनके विकसित होने से टूरिज्म जॉब भी बढ़ेंगे। हमारा प्रयास यह है कि एक महीने में सभी जरूरी काम करा दें।
जयति सिंह, एसडीएम
पिछोर किला और म्यूजियम
रियासतकाल में अंचल की 52 जाट रियासतों में पिछोर का स्थान महत्वपूर्ण रहा। आजादी के बाद ऊंची पहाड़ी पर स्थित पिछोर के किले पर कुछ समय तक सेना ने अपना ठिकाना बनाए रखा था। अब यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत है। वहीं पिछोर कस्बे में मौजूद कालिंदी स्थान को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने का प्लान भी है।
सालबाई गढ़ी
अंग्रेज और मराठा संघ की सेनाओं के बीच हुए तीन युद्धों में से तीसरे युद्ध के बाद १७ मई १७८२ में अंग्रेज और मराठाओं के बीच सालबाई की संधि हुई थी। भारतीय इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना की गवाह डबरा के पास स्थित सालबाई की गढ़ी बनी थी। अब इस जगह को टूरिज्म सर्किट में जोडऩे से यहां का विकास हो सकेगा।
देवगढ़ किला
आसपास की सभी गढ़ी-परकोटे और छोटे किलों में सबसे ज्यादा मजबूत और अजेय किले के रूप में देवगढ़ किले की पहचान है। इस किले से थोड़ी दूरी पर रतनगढ़ माता मंदिर है। इस किले के बारे में कई किवदंतियां प्रचलित हैं। आसपास के लोग इसे रामायण और महाभारतकालीन बताते हैं और यहां किसी को रात बिताने के लिए मना करते हैं।
Published on:
16 Jun 2019 02:07 pm
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