पत्रिका टॉक…संगीत की साधना के लिए सतही धैर्य की जरूरत: पं. राजेंद्र गंगानी
हनुमानगढ़. शास्त्रीय संगीत की साधना का केंद्र मंदिर ही रहे हैं। यहीं रहकर संगीत के साधकों ने सुरों की खोज की। कलाकार राजेंद्र गंगानी ने यह बात राजस्थान पत्रिका से बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि सारे नृत्यों का आधार मंदिर ही रहे हैं। हमारे यहां हर राज्य का अपना शास्त्रीय संगीत है। शिक्षा, संगीत व संस्कृति को धरोहर मानकर इनका संरक्षण करने पर जोर दिया। नाट्य शास्त्र के बारे में बताकर नृत्य सीखने की बारीकियां बताई। गंगानी ने कहा कि संगीत की साधना के लिए सतही धैर्य की जरूरत पड़ती है। इस सोच के साथ ही शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कदम रखना चाहिए। देश ही नहीं विदेशों से लोग इसे सीखने आ रहे हैं। इसलिए हम पहले ऐसे लोगों को हिंदी व संस्कृत सीखने की सलाह देते हैं। ताकि शब्दों के असल भाव वह समझ सकें। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि दुनिया की सारी भाषाएं अपने आप में अलग महत्व रखती है। लेकिन संस्कृत का तोड़ नहीं। उन्होंने कहा कि मेरे हिसाब से सभी भाषाओं का आधार संस्कृत ही रहा है। इसलिए शास्त्रीय संगीत को समझने के लिए संस्कृत और हिंदी को समझना बेहद जरूरी है। अंग्रेजी में इनके मायने और भाव सही से नहीं समझे जा सकते। राजस्थान के बारे में कहा कि कलाकारों के लिए यह भूमि काफी ऊपजाऊ है। कलाकारों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। गंगानी हनुमानगढ़ में कार्यक्रम पुस्तत करने आए थे। उन्होंने बताया कि हनुमानगढ़ के युवाओं में संगीत के प्रति अच्छा रुझान है। शास्त्रीय संगीत को समझने की अच्छी ललल है। भविष्य में शास्त्रीय संगीत की समझ पैदा करने के लिए संगीत संवाद कार्यक्रम करवाने की बात भी कही।