
दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के लिए एक टीका या संभावित उपचार विकसित करना एक बेहद दुष्कर, श्रमसाध्य और धीमी गति से किया जाने वाला विस्तृत प्रयास है। एक ऐसे यौगिक का पता लगाना जो वायरस को नष्ट करने या कम करने का काम करता है, फिर जानवरों पर इसका परीक्षण करना और उसके बाद इसे मानव उपयोग के लिए विभिन्न नैदानिक परीक्षणों पर परखने में वर्षों लग सकते हैं। यहां तक कि वायरोलॉजी और महामारी विज्ञान में शीर्ष विशेषज्ञ भी अभी इस वायरस का कोई पुख्ता इलाज नहीं ढूंढ पाए हैं। एशिया से लेकर यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अफ्रीका तक कोरोना संक्रामक रोग विशेषज्ञ टीके का परीक्षण कर रहे हैं। वायरस के लिए नए परीक्षण विकसित कर रहे हैं या प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए नवीन सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों को विकसित कर रहे हैं। आइए जानते हैं इनमें से कुछ कोरोना नायकों के बारे में-
साराह गिल्बर्ट (ब्रिटेन)
इम्यूनोलॉजिस्ट साराह गिल्बर्ट वर्तमान में कोरोना वायरस से दुनिया को बचाने वाले उन अग्रणी संकट नायकों में से एक हैं जो वायरस का संभावित टीका बनाने के सबसे करीब हैं। वे ऑक्सफोर्ड के जेनर इंस्टीट्यूट में वे नोवेल कोरोनावायरस के टीके के नैदानिक परीक्षणों की जांच कर रही हैं। गिलबर्ट का कहना है कि उन्हें टीका बनाने के लिए एक बार में करीब 5.7 करोड़ (57 मिलियन ) चीजें छाननी पडीं, जो वायरस का एक संभावित टीका तैयार कर सकती थीं। गिल्बर्ट ने मर्स कोरोना वायरस के लिए भी सऊदी अरब में मानव परीक्षण किया था। जैसे ही शंघाई के वैज्ञानिकों ने वायरस के लिए आनुवांशिक अनुक्रम जारी किया, गिल्बर्ट की टीम ने चूहों में परीक्षण करने के लिए कोविड-19 के खिलाफ एक टीका बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने मर्स वैक्सीन की उसी तकनीक का उपयोग करते हुए कोविड-19 वैक्सीन बनाने का काम शुरू कर किया। गिल्बर्ट उन शोधकर्ताओं में भी शामिल थीं जिन्होंने 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए इबोला और मर्स के खिलाफ टीके विकसित करने में मदद की। दुनियाभर में कोविड-19 वायरस की वैक्सीन विकसित करने वाले लगभग तीन दर्जन वैज्ञानिकों में गिल्बर्ट शीर्ष 10 वैज्ञानिकों में से एक हैं।
आन्द्रे कालिल (अमरीका)
कोरोना का एक टीका तैयार होने में अब भी 12 से 18 महीने का समय है लेकिन इस बात की उम्मीद की लगातार बढ़ रही है कि वैज्ञानिलक जल्द ही कोई कारगर वैक्सीन बना लेंगे। ऐसी ही एक उम्मीद हैं नेब्रास्का मेडिकल सेंटर विश्वविद्यालय में निमोनिया में विशेषज्ञता रखने वाले 54 वर्षीय चिकित्सक और वैज्ञानिक आंद्रे कालिल जो अपने स्तर पर कोरोना के टीके के नैदानिक परीक्षणों (क्लिीनिकल ट्रायल्स) को करीब से देख रहे हैं। ब्राजील में जन्मे संक्रामक रोग विशेषज्ञ अमरीका में विकसित हो रही कोरोना वैक्सीन बनाने का काम कर रहे हैं। वे यह निर्धारित करने पर ध्यान लगा रहे हैं कि क्या रेमेडिसविर नामक एक प्रयोगात्मक दवा कोरोनोवायरस रोगियों पर प्रभावी है या नहीं। दर्जनों अस्पतालों में 100 से अधिक रोगियों के साथ परीक्षण कर चुके आन्द्रे को एक या दो सप्ताह में प्रारंभिक परिणाम मिल जाएंगे। उन्हें विश्वास है कि रेमेडिसविर एक गेम चेंजर हो सकती है। जैसे ही कालिल ने जनवरी में चीन में कोरोनावायरस के बारे में पढ़ा उन्होंने संभावित उपचारों की जांच शुरू कर दी। आन्द्रे का कहना है कि रेमेडिसविरसार्स और मर्स जैसे कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी रही है ऐसे में कोविड-19 के इलाज में भी इससे सफलता मिलने की उम्मीद है। संक्रामक रोग विशेषज्ञ कालिल कहते हैं कि उन्होंने 2014-16 में आए इबोला के प्रकोप से महत्वपूर्ण सबक सीखे। लेकिन सरकारें अब भी वहीं गलती दोहरा रहीं हैं।
माइकल रेयान (डब्ल्यूएचओ)
एक ट्रॉमा सर्जन के रूप में प्रशिक्षित आयरलैंड निवासी रेयान 1996 से महामारी विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन में कोरोनोवायरस का नेतृत्व करने वाले और संयुक्त राष्ट्र में आपातकालीन स्वास्थ्य स्थिति कार्यक्रम के प्रमुख माइकल रेयान कहते हैं कि कोरोना ने हमारे सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती पेश की है। उस पर परेशानी यह है कि हम अब भी उन्हीं पुरानी दवाओं का उपयोग और पुन: परीक्षण करने को विवश हैं जिनका उपयोग हम 20 वर्षों से करते आ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों में महामारी पर नियंत्रण पाना और इस दौरान महामारी से लडऩे के लिए देशों को तैयार करने के लिए विकासशील उपचार विधि और स्टॉक पाइलिंग संसाधनों को विकसित करना रेयान का काम है। दुनिया ने पिछले साल कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में इबोला महामारी को रोकने के लिए लगभग 1 बिलियन डॉलर खर्च किए, लेकिन आसपास के देशों ने 65 मिलियन डॉलर का केवल पांचवां हिस्सा ही प्राप्त हो सका जो उन्होंने अमीर देशों से अगले प्रकोप की तैयारी के लिए आर्थिक मदद के लिए अनुरोध किया था। उनका प्रमुख काम धनी राद्यट्रों से महामारी के उपचार संबंधी खर्च जुटाना और गरीब देशों तक उस मदद को पहुंचाना है।
अमाडू अल्फा सल्ल (सेनेगल)
अफ्रीका महाद्वीप के 46 देशों की कुल 1.2 बिलियन आबादी में अभी 5 हजार से ज्यादा कोरोना संक्रमित मामले हैं। इन देशों की नाजुक स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही मलेरिया, एचआईवी और इबोला से जूझ रही है। कोविड-19 से इसे और अधिक खतरा पैदा हो गया है। अफ्रीका को कोरोना समेत अन्य खतरनाक वायरस से बचाने का जिम्मा 50 वर्षीय संक्रामक रोग विशेषज्ञ अमाडू अल्फा सल्ल का है जो एक वैश्विक अनुसंधान केंद्र इंस्टीट्यूट पॉश्चर की सेनेगल शाखा का नेतृत्व करते हैं। जनवरी में जब सल्ल ने चीन में कोरोना के बारे में सुना तो उन्होंने तभी से तैयारी शुरू कर दी थी। उप-सहारा देश नाइजीरिया में 27 फरवरी को पहला कोरोना मामला सामने आने पर सल्ल ने दो प्रमुख प्रयोगशालाओं में एक साथ परीक्षणों की शुरुआत की। फ्रांस और ब्रिटेन में वायरोलॉजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य का अध्ययन करने वाली सल्ल ने वायरस जनित प्रकोपों पर दुनिया भर की सरकारों को सलाह देते हैं। वे अपने अफ्रीकी सहयोगियों के साथ 18 घंटे से भी ज्यादा काम कर रहे हैं ताकि कोरोना का संभावित टीका बनाया जा सके। अभी ब्रिटेन में अपने एक साझेदार वैज्ञानिक के साथ सल्ल कोविड-19 के लिए संभावित टीका विकसित करने पर काम कर रहे हैं। टीके के परीक्षण परिणाम के आधार पर वे कहते हैं कि अगर यह टीका सफल रहा तो मात्र 10 मिनट में वायरस को खत्म कर सकता है। हालांकि टीका बनाने की लागत एक बड़ी चुनौती है। साथ ही उनका उद्देश्य कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियों वाले देशों के लिए भी इस टीके को सस्ता बनाना है। उनकी परीक्षण तकनीक अन्य बीमारियों के लिए काम करने के लिए भी डिज़ाइन की गई है।
लियो यी सिन (सिंगापुर)
कोरोना वायरस का सफलतापूर्वक नियंत्रण करने के लिए सिंगापुर के चिकित्सकीय और प्रबंधकीय मॉडल की दुनिया भर में प्रशंसा की जा रही है। सिंगापुर के इस सफल मॉडल के पीछे संक्रामक रोगों के राष्ट्रीय केंद्र की कार्यकारी निदेशक लियो यी सिन की भूमिका कोसबसे महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। 2003 में सार्स और 2009 में स्वाइन फ्लू से लोहा ले चुकी सिन का अनुभव उनके देश के बहुत काम आ रहा है। जनवरी की शुरुआत में वुहान से वायरस की खबरें सामने आने पर उन्होंने देश में तुरंत वायरस नियंत्रण की शुरुआत की। क्योंकि वे जानती थी कि चीन और सिंगापुर के बीच व्यापक संबंधों को देखते हुए इसे अनिवार्य रूप से लागू करना पड़ेगा। 60 वर्षीय सिन कहती हैं कि हमने सिंगापुर में 23 जनवरी को पहला मामला सामने आने से पहले ही अपना परीक्षण तंत्र विकसित कर लिया था और बड़े पैमाने पर जांच करने के लिए तैयार थे।
सिंगापुर ने रोजाना 2 हजार से अधिक परीक्षण कर सकता है। सिन के केंद्र में शोधकर्ताओं ने तुरंत पॉजिटिव रोगियों में वायरस का अध्ययन शुरू किया। वे जल्द ही वैक्सीन विकसित करने की उममीद कर रही हैं। उन्होंने सिंगापुर के स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए एक रणनीति बदलाव की सलाह देते हुए कहा कि चिकित्सकों के जरिए वे पूरे देश में वायरस के लक्षण नजर आने पर प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम पांच दिन की चिकित्सा अवकाश केसाथ क्वारनटाइन में रहने की सलाह दें ताकि वे घर पर रहें और बीमारी न फैले। उनके नेतृत्व में संक्रमित लोगों के संपर्कों को ट्रेस और अलग करते हुए सिंगापुर ने रैपिड परीक्षण की रणनीति अपनाई। 5.7 मिलियन की आबादी वाले सिंगापुर ने बिना स्कूलों या शॉपिंग मॉल को बंद किए ही वायरस के प्रसार को सीमित करने में कामयाब रहा है।
Published on:
30 Apr 2020 07:38 pm
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