
Gand mool Nakshatra effects on your baby and family
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों की तरह ही नक्षत्र भी हमारे जीवन का अत्यधिक प्रभावित करते हैं। वैदिक ज्योतिष में इन नक्षत्रों की संख्या 27 बताई गई है। जिनके नाम इस प्रकार हैं: अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती।
वहीं इनमें से गण्डमूल नक्षत्र काफी कष्टकारी माना जाता है। मान्यता के अनुसार गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक स्वयं व अपने माता-पिता मामा आदि के लिए कष्ट प्रदान करने वाला होता है।
मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला बालक के संबंध में माना जाता है कि यदि वह शुभ प्रभाव में है तो वह सामान्य बालक से कुछ अलग विचारों वाला होता है, वहीं यदि उसे सामाजिक और पारिवारिक बंधन से मुक्त कर दिया जाए तो ऐसा बालक जिस भी क्षेत्र में जाएगा एक अलग मुकाम हासिल करेगा।
ऐसे बालक तेजस्वी, यशस्वी, नित्य नव चेतन कला अन्वेषी होते है। यह इसके अच्छे प्रभाव हैं।
पंडित सुनील शर्मा के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में गंडमूल नक्षत्रों को दोषकारी माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब किसी शिशु का जन्म गण्डमूल नक्षत्र में हो तो इसको गंडमूल दोष कहा जाता है।
इसके कारण बालक और उसके माता-पिता एवं भाई-बहिनों के जीवन पर कष्टकारी प्रभाव पड़ता है इसलिए इस नक्षत्र में पैदा हुए शिशु और उसके परिजनों की भलाई के लिए गंडमूल शांति के उपाय कराना अति आवश्यक है। ऐसे में इसकी शांति किसी विद्वान और योग्य पंडित से ही करवानी चाहिए जिसे मूल शांति कराने का पूर्ण ज्ञान हो।
क्या करता है ये गंडमूल
यह दोष व्यक्ति के जीवन में परेशानियां पैदा करने में पूर्ण रूप से सक्षम होता है। माना जाता है कि गंड मूल नक्षत्र में जन्में जातक ना सिर्फ अपने परिवार के लिए बल्कि स्वयं अपने लिए भी परेशानी बन जाते हैं।
कहा जाता है कि मूल नक्षत्र के पहले चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति के पिता को जीवनभर कष्ट मिलता है। दूसरे चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति की माता, तीसरे में धन की हानि होती है। जबकि चौथा चरण शुभ माना गया है।
गंडमूल: ऐसे समझें...
दरअसल हिन्दू ज्योतिष में 27 नक्षत्र होते हैं। इनमें केतु व बुध के स्वामित्व में आने वाले नक्षत्रों को गंड मूल कहते हैं, जो इस प्रकार हैं:—
नक्षत्र : स्वामी ग्रह : देवता
अश्वनी : केतु : अश्विनी कुमार
अश्लेषा : बुध : सर्प
मघा : केतु : पितृ
ज्येष्ठा : बुध : इंद्र
मूल : केतु : राक्षस
रेवती : बुध : सूर्य
ऐसे बनता है गण्डमूल योग?
राशि और नक्षत्र के एक ही स्थान पर मिलने या उदय होने पर गण्डमूल नक्षत्रों का निर्माण होता है। जो इस प्रकार हैं-
: यदि कर्क राशि तथा अश्लेषा नक्षत्र की समाप्ति साथ होती है। वही सिंह राशि का प्रारंभ और मघा नक्षत्र का उदय एक साथ हो तो इसे अश्लेषा गण्ड संज्ञक और मघा मूल संज्ञक नक्षत्र कहा जाता है।
: यदि वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र की समाप्ति एक साथ हो तथा धनु राशि और मूल नक्षत्र का आरम्भ यही से हो तो इस स्थिति को ज्येष्ठा गण्ड और ‘मूल’ मूल नक्षत्र कहा जाता है।
: यदि मीन राशि और रेवती नक्षत्र एक साथ समाप्त हो तथा मेष राशि व अश्विनी नक्षत्र की शुरुआत एक साथ हो तो इस स्थिति को रेवती गण्ड और अश्विनी मूल नक्षत्र कहा जाता है।
गंडमूल नक्षत्र दोषकारी, जानें क्यों?
हिन्दू ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र, लग्न और राशि के संधि काल को अशुभ माना जाता है और गंड मूल नक्षत्र संधि नक्षत्र होते हैं, इसलिए जातक पर इसके अशुभ प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इसके साथ ही गंडमूल नक्षत्रों के देवता भी बुरे प्रभाव देने वाले होते हैं।
ये नक्षत्र मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु व मीन राशी के आरम्भ व अंत में आते हैं। काल पुरुष चक्र के अनुसार इन राशियों का प्रभाव जातक के शरीर, मन, बुद्धि, आयु, भाग्य आदि पर पड़ता है और गंडमूल का प्रभाव भी इन्हीं के ऊपर देखने को मिलता है।
गंडमूल दोष का असर
यदि कोई बालक गंडमूल नक्षत्र में पैदा होता है तो उसे तथा उसके परिजनों को कई कष्टों का सामना करना पडता है:-
: जातक को स्वास्थ्य संबंधी कष्टों का सामना करना पड़ता है।
: माता-पिता एवं भाई-बहिनों के जीवन पर बाधाएं आती हैं।
: जातक के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
: जातक को जीवनयापन में संघर्ष करना पड़ता है।
: जातक के परिवार में दरिद्रता आती है।
: दुर्घटना का भय बना रहता है।
: जातक भाग्यहीन हो जाता है।
गंडमूल शांति के ये हैं उपाय...
यदि किसी शिशु का जन्म गंडमूल में हुआ है तो जन्म के 27वें दिन ठीक उसी नक्षत्र के आने पर शांति करनी चाहिए। इसके लिए कई तरह से उपाय किए जा सकते हैं:-
: सर्प को दूध पिलायें।
: नाग देव का पूजन करें।
: पितृों के निमित्त दान करें।
: घर में गंडमूल शांति के लिए यज्ञ करें।
: अमावस्या के दिन ब्राह्मण भोजन कराएं।
: किसी मंदिर में शिवलिंग को स्थापित करें।
: प्रत्येक अमावस्या को गौ, स्वर्ण, अन्न आदि का दान करें।
: माता या पिता 6 माह तक विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
इन सब उपायों के अलावा गंड मूल में जन्में बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन गंड मूल शांति पूजा करवाई जानी चाहिए, इसके अलावा ब्राह्मणों को दान, दक्षिणा देने और उन्हें भोजन करवाना चाहिए। यदि किसी कारणवश पूजा ना करवाई जा सके तो महीने के जिस भी दिन चंद्रमा जन्म नक्षत्र में मौजूद हो उसी दिन शांति पूजा करवाई लेनी चाहिए।
यदि गंडमूल शांति के उपाय शिशु के जन्म से ठीक 27वें दिन न हो पाएं अथवा किसी कारण से गंडमूल दोष के बारे में आपको विलम्ब से पता चले तो भी आप इसकी शांति के उपाय कर सकते हैं।
Published on:
26 Apr 2020 07:11 pm
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