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कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर्ज और पैसों की तंगी करता है दूर! जीवन बदल सकते हैं इसके ये 7 लाभ!

Kanakdhara Stotram Lyrics in Hindi: मान्यता है, कनकधारा स्तोत्रम् को शुक्रवार के दिन पढ़ना सारी मनोकामनाओं को पूरी करता है। यहां पढ़ें कनकधारा स्तोत्रम् हिंदी में, लाभ सहित।

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भारत

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Adarsh Thakur

Jan 22, 2026

Kanakdhara Stotram Lyrics in hindi

Kanakdhara Stotram Lyrics in hindi: कनकधारा स्तोत्र के पाठ से पूरी होती हैं हर मनोकामना। (फोटोः एआई)

कनकधारा स्तोत्र के पाठ के 7 लाभ | Kanakdhara Stotram Benifits

  1. आर्थिक तंगी से मुक्ति: इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य दरिद्रता का नाश करना है। जैसा कि आठवीं कड़ी में उल्लेख है, यह गलत कर्म और दुर्भाग्य को दूर कर धन की वर्षा करने में सहायक माना जाता है।
  2. अचानक धन लाभ (Sustained Prosperity): इसके नियमित पाठ से जीवन में कनक (सोना) और लक्ष्मी की धारा प्रवाहित होने की मान्यता है, जिससे व्यापार और करियर में उन्नति के योग बनते हैं।
  3. पापों का नाश: यह केवल धन ही नहीं देता, बल्कि जाने-अनजाने में हुए उन पापों का भी शमन करता है, जो हमारी प्रगति में बाधा बनते हैं।
  4. सौभाग्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति: देवी लक्ष्मी की कटाक्ष (कृपा दृष्टि) प्राप्त होने से साधक को समाज में मान-सम्मान, पद और प्रतिष्ठा हासिल होती है।
  5. ऋण (कर्ज) से छुटकारा: यदि कोई व्यक्ति भारी कर्ज में दबा है, तो कनकधारा स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से आय के नए स्रोत बनते हैं और कर्ज से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
  6. मानसिक शांति और एकाग्रता: इस स्तोत्र की कोमल और लयबद्ध शब्दावली मन को शांत करती है और भक्त को भगवान नारायण और माता लक्ष्मी की भक्ति में लीन करती है।
  7. सर्व सुखों की प्राप्ति: स्तोत्र के अंतिम भाग के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन माता लक्ष्मी की इस स्तुति का गान करते हैं, वे भाग्यशाली बनते हैं और संसार के सभी श्रेष्ठ गुणों व सुखों का उपभोग करते हैं।

।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।। Shree Kanakdhara Stotram Lyrics in Hindi

अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।

मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।

नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।

सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

।। इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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