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मछली पालन व्यवसाय को नहीं मिला बढ़ावा, हजारों मछुआरे बेरोजगार

नर्मदा-तवा नदी में मत्स्याखेट के पुस्तैनी धंधे से भी वंचित हो रहे मांझी-केवट,रेत भराई, तरबूज-खरबूज और सब्जियों की डंगरवाड़ी भी साथ नहीं दे रही,नागपुर, कोलकाता अन्य शहरों में भी घटी मीठे पानी की मछलियों की मांग,जिले में नहीं जिला मत्स्य अधिकारी, सहायक के भरोसे चल रही योजनाएं

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मछली पालन व्यवसाय को नहीं मिला बढ़ावा, हजारों मछुआरे बेरोजगार

मछली पालन व्यवसाय को नहीं मिला बढ़ावा, हजारों मछुआरे बेरोजगार

देवेंद्र अवधिया
होशंगाबाद. जिले में हजारों मांझी-मछुआ परिवार सालों से नर्मदा-तवा तटों के निवास करते चले आ रहे। समाज के मछुआरों की संख्या करीब डेढ़ लाख के करीब है। मत्स्याखेट इनका पुस्तैनी व्यवसाय है, लेकिन मुख्य नर्मदा-तवा नदी में बढ़ते प्रदूषण और सहायक नदियों के सूखने से मछलियों की भारी कमी से इनका ये रोजगार भी छिन रहा है। हालत ये है कि इनके रोजगार-व्यवसाय के दूसरे विकल्प जैसे रेत भराई, तरबूज-खरबूज और सब्जियों की डंगरवाड़ी साथ नहीं दे रहे। नहरों के चलते एवं खदानों के बंद रहने से इन्हें घरों में खाली हाथ बैठना पड़ रहा। मछली पालन के जो सरकारी तालाब हैं वह भी दूसरे लोगों के कब्जे में हैं। जिला मस्त्य विभाग भी इन मांझी-मछुआ परिवारों के कल्याण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। इस कारण भी जिले में 50 हजार से अधिक मछुआरे बेरोजगार चल रहे। इन्हें सहकारिता विभाग से भी कोई लाभ नहीं मिल रहा। बता दें कि पिछले सालों में जिले के नर्मदा-तवा की मीठे पानी की मछलियों कतला, रोहु, समल, नरेन, कामनकार्प, लोकल गेगड़े, बाम, बाड़स आदि प्रदेश-देश में खासी डिमांड रहती थी, जो अब नाम मात्र रह गई है। इनमें बाड़स मछली तो विलुप्त होने की कगार पर है।

कागजों में चल रही विभागीय योजनाएं
मांझी-केवट समाज के रनदीप कहार, रविशंकर संतोरे, राजेश रैकवार, प्रदीप मांझी, संतोष मांझी, राजेश मांझी, पूरन आदि बताते हैं कि मछलीपालन व आखेट समाज की पीढ़ी-दर पीढ़ी पुस्तैनी धंधा है, लेकिन ये भी वर्तमान में छिन चुका है। कहने को ही मत्स्य विभाग है, सिर्फ कागजों में ही योजनाएं और मछली पालन तालाब चले रहे। जो समितियां एवं समूह हैं उनमें भी समाज की कोई हिस्सेदारी नहीं बची। ज्यादातर इन पर दूसरे वर्ग के लोग काबिज हैं। विभाग कर्मचारियों की कमी बताकर योजनाओं की कोई जानकारी ही नहीं देता। जो भी मछुआरे कार्यालय जाते हैं, उन्हें जानकारी नहीं दी जाती है।

नीलक्रांति व पीएम मत्स्य संपदा का भी लाभ नहीं
जिले में नीलक्रांति एवं पीएम मत्स्य संपदा योजना चल रही, लेकिन इसका लाभ भी मांझी-केवट, रैकवार समाज को नहीं मिल पा रहा। हजारों युवा बेरोजगार घूम रहे। तवा बांध में बड़े स्तर पर मछलीपालन व आखेट होता है, लेकिन इसमें भी समाज की भागीदारी नहीं बढ़ रही। बाहर के लोग इसका फायदा उठा रहे। नर्मदा नदी में मछलियों की भारी कमी से मत्स्याखेट नाम मात्र का हो चुका है।

करीब डेढ़ लाख से अधिक मछुआरा परिवार
मांझी-केवट समाज के जिले भर में करीब डेढ़ लाख से अधिक मछुआरा परिवार नदियों के किनारे-तटीय क्षेत्र में निवासरत हैं। इसमें होशंगाबाद में भीलपुरा, बीटीआई, डोंगरवाड़ा,बरंडुआ,रंढाल,रायपुर-मालाखेड़ी,बांद्राभान,तखतपुर,गोरा, शुक्करवाड़ा,गनेरा, सांडिया, सिवनीमालवा, बाबरी, नेमावर तक फैले हुए हैं। लेकिन मछुआरों की परिभाषा ही बदल दी गई है। इनकी जगह किसानों को मछुआरा बना दिया गया है। जमीन, तालाब नहीं होने से वंशानुगत मत्स्याखेट का काम भी छिनता जा रहा है। सरकारी-निजी तालाबों में भी इनकी कोई भागीदारी नहीं हो रही।

जिला अधिकारी ही नहीं, सहायक के भरोसे
मत्स्य विभाग में जिला अधिकारी ही नहीं है। सहायक अधिकारी व निरीक्षक के भरोसे पूरा विभाग व योजनाएं चल रही है। पूर्व के जिला अधिकारी शिकायतों की जांच के बाद से अटैच चल रहे। विभागीय योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी नहीं हो रहा। ज्यादातर योजनाएं पंचायतों के भरोसे है। इसमें भी मांझी समाज के लोगों को लाभ नहीं मिल पा रहा।

तवा बांध से भी नहीं मिल रहा लाभ
मांझी-केवट समाज के परिवारों को जिले के सबसे बड़े तवा बांध से भी लाभ नहीं मिल रहा, जबकि इसमें बड़े पैमाने पर मछलीपालन व्यवसाय होता है। बांध से तवा मत्स्य महासंघ के जरिए जिले व जिले से बाहर मछलियों का परिवहन होता है। तवा नदी का आधा वन क्षेत्र होने से बांध में मछुआरों को अनुमति नहीं दी जाती है, जबकि रेत की तरह ही बांध में मछली का अवैध मत्याखेट होता है।

जिले में एक नजर में मछुआरों की स्थिति
-जिले में मांझी-केवट समाज की आबादी: करीब डेढ़ लाख
-मुख्य धंधा: मछलीपालन-आखेट, रेत मजदूरी, डंगरवाड़ी
-जिले में मछुआरा समितियों की संख्या करीब 65 से अधिक
-जिले में बने है मछलीपालन व्यवसाय के करीब 255 तालाब
-जिला मत्स्य पालन विभाग में नहीं है जिला स्तर का अधिकारी
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इनका कहना है...

समाज के मछुआरा परिवारों को सहकारिता व मत्स्य विभाग भी कोई काम नहीं दे पा रहा। कई समितियां तो कागजों पर ही चल रही है। मछुआरों को प्रशिक्षण के नाम पर भी गड़बड़ी हो रही। विभागीय योजनाओं की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
-प्रदीप मांझी, जिला संयोजक निषाद सेना

मछुआरा समाज के कल्याण के लिए कोई ठोस काम नहीं हुए हैं। योजनाओं में समिति-समूहों को लाभ नहीं मिल रहा। नदी में मछलीपालन में बीमा, केसीसी बनाने मे भी दिक्कतें आ रही है। न डंगरवाड़ी लगा पा रहे और न ही खदानों में मजदूरी मिल रही है।
-संतोष मांझी, मांझी समाज भीलपुरा होशंगाबाद

इनका कहना है...
पीएम मत्स्य संपदा योजना में अन्य सभी योजनाएं समाहित की गई है। योजना में जिले को अभी कोई अलाटमेंट नहीं मिल सका है। अगले साल के लिए डीपीआर तैयार हो चुकी है। अनुमोदन की प्रतिक्षा है। मांझी-मल्लाह, केवट समाज के लोगों के समूहों को मछली तालाब के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
-एमआर काले, सहायक मत्स्य अधिकारी होशंगाबाद