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Jet Airways Failure Story: जानिए किन गलतियों की वजह डूब गई एक कामयाब एयरलाइन कंपनी

जेट एयरवेज (Jet Airways) एयरलाइन के डूबने की कहानी 2007 से ही शुरू हो गई थी

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नई दिल्ली। 18 अप्रैल, 2019 को जेट एयरवेज (Jet Airways) के विमान ने मुंबई हवाई अड्डे पर लैंडिंग की थी। ये जेट एयरवेज की आखिरी उड़ान थी। निजी क्षेत्र की इस एयरलाइन को अब बंद हुए एक साल हो चुके हैं। आज हम आपको समझाने की कोशिश करेगें की एक कामयाब एयरलाइन कंपनी (airline company) देखते ही देखते कैसे ड़ूब गई।

साल 2007 से शुरू हुआ था सिलसिला

जेट एयरवेज (Jet Airways) एयरलाइन के डूबने की कहानी 2007 से ही शुरू हो गई थी जब जेट एयरवेज़ के चेयरमैन नरेश गोयल (naresh goyal) नें सहारा एयरलाइंस (sahara airlines) को लगभग1450 करोड़ रुपए में खरीद लिया था। ये फैसला नरेश के साथ-साथ जेट एयरवेज के भविष्य के लिए खतरा बन गया ।

ये भारतीय विमानन के इतिहास में अब तक का यह सबसे बड़ा सौदा था। इस सौदे के बाद जेट भारत की सबसे बड़ी घरेलू विमान कंपनी बन गई थी। लेकिन इस इस डील के साथ ही जेट फाइनेंशियल, लीगल और HR की कई मुश्किलों में फंस गई।

डक्कन, इंडिगो और स्पाइसजेट को मात देने के लिए खरीदा था सहारा

नरेश गोयल ने सहारा को एयर डक्कन, इंडिगो और स्पाइसजेट को मात देने के लिए खरीदा था लेकिन ये सब उल्टा हो गया। साल 2012 में किंगफिशर बंद हो गई। इसके बाद गोयल ने मनमानी ढंग से प्लेन का ऑर्डर दे दिया। जो प्लेन मंगाए गए थे उनमें सीटें भी कम रखी गई थी। ऐसे में कंपनी को मुनाफा कम होता था। इतना ही नहीं जिन प्लेन को गोयल ने मंगाया था उसमें 8 फ़र्स्टक्लास की सीटें थी। जिनकी बुकिंग ही नहीं होती थी। ऐसे में 250 किलो की एक-एक सीट का बोझ एयरक्राफ्ट बिना पैसों के ढो रही थी।

इतना ही नहीं नरेश गोयल ने जिन अधिकारियों को जेट एयरवेज चलाने के लिए नियुक्त किया था, उनपर कभी भरोसा नहीं करते थे। क्योंकि उनके सारे फैसले खुद के थे। वे किसी की बात नहीं सुनते थे।

बैंको के कर्ज से लद गया जेट

जेट एयरवेज (Jet Airways) पर कई बैंको का कर्ज लद गया। अब नरेश को कंपनी के डूबने का डर सताने लगा। 2018 में नरेश फाइनेंशियल एडवाइजर्स के साथ दीपक पारेख से मिलने गए। वे जानना चाहते थे कि जेट को कैसे बचाया जाए। दिपक ने उनसे कहा अभी भी मौका है वह पीछे हट जाएं और नए निवेशकों को मौका दें। नरेश को ये बात भी समझ नहीं आई। वे बोर्ड की सदस्यता से इस्तीफा नहीं देना चाहते थे। तो उन्हेोंने दिपक को भी अनसुना कर दिया।

जेट के बुरे दौर में टाटा ग्रुप उसे खरीदना चाहता थी लेकिन नरेश ने इसपर भी सहमती नहीं दिखाई। जेट एयरवेज को बचाने के लिए उन्होंने सबकी बात सुनी लेकिन हमेशा अपने मन की। नतीजा ये हुआ कि की जेट में रूचि ले रहे टाटा ग्रुप ने भी अपना हाथ पीछे खींच लिया।

2019 में डूब गया जेट का सूरज

2019 की जनवरी तक नरेश ने अपना पद संभाल रखा था। लेकिन जेट एयरवेज को हाथ से छोड़ चुके थे। कंपनी धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। कारोबार भी बंद हो गया। इसके बाद कंपनी को हर दिन 21 करोड़ का लॉस हो रहा था। जेट एयरवेज ने पिछले साल 17 अप्रैल को अपनी सेवाओं को अस्थायी रूप से स्थगित करने की घोषणा की थी। एयरलाइल की आखिरी उड़ान एस2-3502 अमृतसर से मुंबई के छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए रवाना हुई थी।

अब भी है एक उम्मीद

जेट एयरवेज पर 25 बैंकों का 8,500 करोड़ रुपये बकाया है. साथ ही कंपनी पर 23,000 कर्मचारियों और सैकड़ों वेंडरों का भी 13,000 करोड़ रुपये बकाया है। हालांकि जेट के कर्मचारी अब भी इस उम्मीद पर है कि बैंकरप्सी रेज्योलूशन के बाद जेट एयरवेज एकबार फिर से अपने पंख फैला कर उड़ान भर पाएगी।