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पाकिस्तान के मिनी काबुल में 40 साल से अपनी पहचान तलाश रहे हैं अफगान शरणार्थी

Pakistan में हैं 13.9 लाख से ज्यादा Afghan refugees 40 वर्षों से पाकिस्तान के 'मिनी काबुल' में रह रहे हैं

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नई दिल्ली। पाकिस्तान में 13.9 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थी हैं। जिनमें से कई यहां 40 से भी ज्यादा वर्षों से रह रहे हैं। इसमें से ज्यादातर लोग पाकिस्तान के "मिनी काबुल" में रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी और पाकिस्तान ने इनके लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है। जिसका उद्घाटन आज प्रधानमंत्री इमरान खान करने वाले हैं। संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के प्रमुख एंतोनियो गुतारेस (Antonio Guterres) भी अफगान शरणार्थियों (Afghan Refugee) पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान पहुंच चुके हैं। वे पाकिस्तान में 40 वर्षों तक अफगान शरणार्थियों को पनाह देने के विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करेंगे।

आपको बता दें अफगान शरणार्थी पिछले 40 वर्षों से पाकिस्तान के "मिनी काबुल" में अपनो के साथ रह रहे हैं। वे अपने जीवन यापन के लिए गाड़ी में ताजे फल बेचते हैं। बाजार में काबुली पुलाओ जैसे अफगान व्यंजन बेचते हैं। अफगान शरणार्थियों के लिए पाकिस्तान में रहना बेहद कठीन है। ये वो लोग हैं जो अपना जीवन बनाने के लिए युद्ध से भागे हुए हैं। बाद में ये सभी पाकिस्तान में घुस आए और यहीं रहने लगे। ये यहां सालों से रह रहे हैं लेकिन अभी भी अनिश्चित भविष्य और नागरिकता के लिए कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है।

अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत के 50 वर्षीय मजदूर नियाज मोहम्मद बताते हैं, हमने अपना पूरा जीवन यहीं बिताया, हमारी शादियाँ भी यहीं हुई। हमारे बच्चे यहीं पैदा हुए । अफगानिस्तान में शांति नहीं है हम यहां खुश हैं।

पाकिस्तान दुनिया में सबसे बड़े शरणार्थी-होस्टिंग राष्ट्रों में से एक है, अनुमानित 2.4 मिलियन पंजीकृत और अविवादित लोगों का घर है जो अफगानिस्तान से भाग गए हैं, कुछ लोग 1979 के सोवियत आक्रमण के बाद से ही यहां आ कर रह रहे हैं। यहां ज्यादातर लोग शिविरों में रहते हैं, जबकि कुछ लोगों ने पाकिस्तान के शहरों में खुद के लिए घर भी बना लिया है। वे पाकिस्तान सरकार को टैक्स भी देते हैं और देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान दे रहे हैं।

पेशावर में "मिनी काबुल" में 5,000 दुकानें हैं जो सभी अफगान शरणार्थियों द्वारा संचालित होती हैं। लेकिन इतना सब होने के बाद भी इनकी जिंदगी इस देश में अस्थायी है। इन्हें कभी भी निकाला जा सकता है। जब भी पाकिस्तान की अफगानिस्तान से अनबन होती है सबसे पहले इन्हें देश से बाहर करने की मांग उठने लगती है। कई पाकिस्तानी उन्हें संदेह की दृष्टि से देखते हैं, उन पर उग्रवाद और आपराधिकता फैलाने का आरोप लगाते हैं और उन्हें घर भेजने के लिए कहते हैं।

यहां कुछ ऐसे भी अफगान शरणार्थी हैं जो दशको से यहां रह रहे हैं लेकिन आज तक उनके पास पहचान पत्र तक नहीं है। वे अपने संपत्ति के मालिक नहीं हैं। पहले तो इनके पास बैंक खाते भी नहीं थे। लेकिन हाल ही में इन्हें इमरान सरकार ने बैंक खाते खोलने की अनुमति दी है।सत्ता में आने के कुछ समय बाद, प्रधान मंत्री इमरान खान ने उन्हें नागरिकता देने की कसम खाई थी लेकिन विवादास्पद वादे से नाराजगी फैल गई, और इसके बाद से बात नहीं की गई।

फिर भी, कई शरणार्थियों ने कहा कि उन्हें अपना घर पसंद है। 28 साल के जावेद खान का जन्म पाकिस्तान में हुआ था, उन्होंने एक पाकिस्तानी महिला से शादी की है और उनके तीन बेटे हैं। उन्होंने कहा, मैं मरने के बाद ही पाकिस्तान छोड़ूंगा।