
retire Army's dogs
नई दिल्ली। दुनिया मे कुत्ता ही एक ऐसा जानवर है जिसकी वफादारी की मिसाल हर जगह सुनने व देखने को मिल जाती है। और इस जानवर की वफादारी को देखते ही लोग इसे पालना बेहतर समझते है लेकिन हमारे भारत में कभी ऐसे भी नियम थे जब इंडियन आर्मी के कुत्तों को वफादारी के बदले दी जाती थी मौत की सजा। जीं हां ये बात सच है कि आर्मी के कुत्ते भले ही पूरी वफादारी के साथ भारतीय सेना के बीच रहकर हर जोघिम काम करते हैं लेकिन जब यही कुत्ते रिटायर हो जाते थे तो उन्हें गोली मारकर या जहर देकर मार दिए जाता था।
आर्मी इन कुत्तों को देती है खास ट्रेनिंग
इंडियन आर्मी के कुत्ते काफी तेज होते है। और वो एक इंसान की तरह काम करने में सक्षम होते है। उन्हें ऐसा ट्रेनिंग दी जाती है कि वो सिर्फ सूंघकर ही आने वाले खतरे से अगाह करा देते है भारतीय सेना के पास ज्यादातर ऊंची नस्ल के कुत्ते जैसे लैब्राडॉर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड होते हैं। ये कुत्ते नाम और नंबर से पहचाने जाते हैं। इनका इस्तेमाल सेना अपने विस्फोटक खोजी दस्ते में करती है। सेना का घुड़सवार दस्ता माउंटेन रेजिमेंट वैसे ही चर्चित है। ऊंचाई के क्षेत्रों में माल वगैरह ढोने में भी घोड़े, खच्चरों का इस्तेमाल होता है।
हर नस्ल के कुत्तों में अलग अलग टैलेंट होता है और सेना में उन्हें उनकी काबलियत के अनुसार ही अलग-अलग कामों में लगाया जाता है। साथ ही कई बार कुत्ते ऐसे काम भी कर जाते है जो सेना के जवान नही कर पाते है।
आर्मी क्यों करती थी ऐसा?
अंग्रेजों के समय से चली आ रही इस पंरपरा को इंडियन आर्मी भी देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते निभाती आ रही थी। क्योंकि आर्मी के लोगों को डर रहता था कि कहीं एक्सपर्ट कुत्ते गलत लोगों के हाथों में पड़ गए तो आर्मी के सेफ और खूफिया ठिकानों के बारे में पूरी जानकारी लीक हो सकती है।
इसके अलावा उन कुत्तों को भी मार दिया जाता था जो गंभीर रूप से चोटिल हो या बीमार हो जाते थे। बैसे शुरूआत में कुत्ते के साधारण बीमार पड़ने पर भारतीय सेना उसका इलाज कराती हैं, लेकिन अगर उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं होता और उसके ठीक होने की संभावना नहीं दिखती तो उसे गोली मार दी जाती है। ऐसा केवल कुत्तों के साथ ही नहीं होता था, बल्कि सेना के उपयोग में आने वाले हजारों घोड़ों और खच्चरों को भी काम का भी यंही अंजाम किया जाता था। इसे एनिमल यूथेनेशिया कहा जाता था। इस मामले में उन कुत्तों को छोड़ दिया जाता था, जिन्होंने कोई पुरस्कार जीता हो।
2015 से ही कुत्तों को न मारने के लिए नीति तैयार कर रही थी सरकार
2015 में सरकार ने कहा था कि वह ऐसी नीति तैयार कर रही है, जिसके तहत आर्मी के डॉग्स को मारा नहीं जाएगा बल्कि इसका लिए कोई दूसरा विकल्प ढूंढा जाएगा। इन विकल्पों में से एक उन्हें एडॉप्ट करना भी है। जो दूसरे कई देश करते आ रहे है।
अलग-अलग देशों में रिटायर आर्मी डॉग्स को लेकर ये हैं कानून
अमेरिका भले ही दूसरे देश के ले दुश्मन बना हो लेकिन इस मामले वो भारत से सही है। यहां पर रिटायर होने वाले आर्मी डॉग्स को लोग अडॉप्ट कर लेते हैं। जिन्हें एडॉप्ट नहीं किया जाता, उन्हें एक खास एनजीओ को दे दिया जाता है। जो उनके आखिरी के दिनों में उनकी दवा आदि की अच्छी व्यवस्था करता है। इतना ही नही रूस और चीन जैसे देशों में भी कुत्तों को रिटायर होने के बाद गोली मारने का कानून नहीं है।
Updated on:
10 Feb 2021 06:58 pm
Published on:
10 Feb 2021 06:50 pm
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