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Chandra Shekhar Azad Jayanti 2020: जब पिता के डर से घर छोड़ के भाग गए थे आजाद, जंगल में बितानी पड़ी थी 3 रात

करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) की आज जयंती है। आजाद की आज जयंती है। 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ में जन्मे आजाद के नाम मात्र से अंग्रेज कांप जाते थे। जयंती के मौके पर पढ़ें आजाद से जुड़े कुछ रोचक प्रसंग।  

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Vivhav Shukla

Jul 23, 2020

Chandra Shekhar Azad Jayanti 2020

Chandra Shekhar Azad Jayanti 2020

Chandra Shekhar Azad Jayanti 2020: अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और करोड़ों युवाओं के प्रेरणास्रोत चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) की आज जयंती है। आजाद की आज जयंती है। 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ में जन्मे आजाद के नाम से अंग्रेज कांपते थे। आजाद के बचपन का नाम चंद्रशेखर सीताराम तिवारी (Chandra Shekhar Sitaram TiwarI) था। स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेजों की चूले हिला देने वाले आजाद ने कसम खाई थी कि वे कभी जिंदा अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे और आखिरी दम तक अपनी इस प्रतिज्ञा पर कायम रहे। आइए जानते हैं चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) से जुड़ी कुछ रोचक बातें।

चंद्रशेखर (Chandra Shekhar Azad) के बारे में एक कहानी बहुत ही प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक आदिवासी ग्राम भावरा के अधनंगे आदिवासी बालक मिलकर दीपावली की खुशियाँ मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझड़ियां थीं, किसी के पास पटाखे थे और किसी के पास मेहताब की माचिस। बालक चन्द्रशेखर के पास इनमें से कुछ भी नहीं था। वह खड़ादृखड़ा अपने साथियों को खुशियां मनाते हुए देख रहा था। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, वह उसमें से एक तीली निकालता और उसके छोर को पकड़कर डरतेदृडरते उसे माचिस से रगड़ता और जब रंगीन रौशनी निकलती तो डरकर उस तीली को जमीन पर फेंक देता था।

बालक चन्द्रशेखर(Chandra Shekhar Azad) से यह देखा नहीं गया, वह बोला -तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते। मैं सारी तीलियाँ एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूं। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, उसने वह चन्द्रशेखर के हाथ में दे दी और कहा -जो कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूं।

बालक चन्द्रशेखर (Chandra Shekhar Azad)ने माचिस की सारी तीलियां निकालकर अपने हाथ में ले लीं। वे तीलियां उल्टीदृसीधी रखी हुई थीं, अर्थात कुछ तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की तरफ भी था। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क करके सारी तीलियाँ जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर चन्द्रशेखर की हथेली को जलाने लगीं। असह्य जलन होने पर भी चन्द्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं छोड़ा, जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नहीं हो गई। जब उसने तीलियां फेंक दीं तो साथियों से बोला - देखो हथेली जल जाने पर भी मैंने तीलियां नहीं छोड़ीं। उसके साथियों ने देखा कि चन्द्रशेखर की हथेली काफी जल गई थी और बड़ेदृबड़े फफोले उठ आए थे।

कुछ लड़के दौड़ते हुए उसकी मां के पास घटना की ख़बर देने के लिए जा पहुँचे। उसकी माँ घर के अन्दर कुछ काम कर रही थी। चन्द्रशेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी बाहर के कमरे में थे। उन्होंने बालकों से घटना का ब्योरा सुना और वे घटनास्थल की ओर लपके। बालक चन्द्रशेखर (Chandra Shekhar Azad) ने अपने पिताजी को आते हुए देखा तो वह जंगल की तरफ भाग गया। उसने सोचा कि पिताजी अब उसकी पिटाई करेंगे। तीन दिन तक वह जंगल में ही रहा। एक दिन खोजती हुई उसकी माँ उसे घर ले आई। उसने यह आश्वासन दिया था कि तेरे पिताजी तेरे से कुछ भी नहीं कहेंगे।